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Rigveda Mandal 7 / Sukta 21 / Mantra 5

104 Sukta
10 Mantra
7/21/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वसिष्ठः Chhanda- स्वराट्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न या॒तव॑ इन्द्र जूजुवुर्नो॒ न वन्द॑ना शविष्ठ वे॒द्याभिः॑। स श॑र्धद॒र्यो विषु॑णस्य ज॒न्तोर्मा शि॒श्नदे॑वा॒ अपि॑ गुर्ऋ॒तं नः॑ ॥५॥

न । या॒तवः॑ । इ॒न्द्र॒ । जू॒जु॒वुः॒ । नः॒ । न । वन्द॑ना । श॒वि॒ष्ठ॒ । वे॒द्याभिः॑ । सः । श॒र्ध॒त् । अ॒र्यः । विषु॑णस्य । ज॒न्तोः । मा । शि॒श्नऽदे॑वाः । अपि॑ । गुः॒ । ऋ॒तम् । नः॒ ॥

Mantra without Swara
न यातव इन्द्र जूजुवुर्नो न वन्दना शविष्ठ वेद्याभिः। स शर्धदर्यो विषुणस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवा अपि गुर्ऋतं नः ॥

न। यातवः। इन्द्र। जूजुवुः। नः। न। वन्दना। शविष्ठ। वेद्याभिः। सः। शर्धत्। अर्यः। विषुणस्य। जन्तोः। मा। शिश्नऽदेवाः। अपि। गुः। ऋतम्। नः ॥५॥

Ashtak » 5 Adhyay » 3 Varga » 3 Mantra » 5

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Meaning
हे (शविष्ठ) अत्यन्त बलयुक्त (इन्द्र) दुष्ट शत्रुजनों के विदीर्ण करनेवाले जन ! जैसे (यातवः) संग्राम को जानेवाले (नः) हम लोगों को (न)(जूजुवुः) प्राप्त होते हैं और जो (शिश्नदेवाः) शिश्न अर्थात् उपस्थ इन्द्रिय से विहार करनेवाले ब्रह्मचर्य्यरहित कामी जन हैं वे (ऋतम्) सत्यधर्म को (मा, गुः) मत पहुँचें (अपि) और (नः) हम लोगों को (न) न प्राप्त हों वे ही (विषुणस्य) शरीर में व्याप्त (जन्तोः) जीव को (वेद्याभिः) जानने योग्य नीतियों से (वन्दना) स्तुति करने योग्य कर्मों को न पहुँचे और (यः) जो (अर्यः) स्वामी जन शरीर में व्याप्त जीव को (शर्धत्) उत्साहित करे (सः) वह हम को प्राप्त हो ॥५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो कामी लंपट जन हों, वे तुम लोगों को कदापि वन्दना करने योग्य नहीं, वे हम लोगों को कभी न प्राप्त हों, इसको तुम लोग जानो और जो धर्मात्मा जन हैं, वे वन्दना करने तथा सेवा करने योग्य हैं, कामातुरों को धर्मज्ञान और सत्यविद्या कभी नहीं होती है ॥५॥
Subject
अब कौन तिरस्कार करने योग्य हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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