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Rigveda Mandal 7 / Sukta 11 / Mantra 4

104 Sukta
5 Mantra
7/11/4
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- भुरिक्पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒ग्निरी॑शे बृह॒तो अ॑ध्व॒रस्या॒ग्निर्विश्व॑स्य ह॒विषः॑ कृ॒तस्य॑। क्रतुं॒ ह्य॑स्य॒ वस॑वो जु॒षन्ताथा॑ दे॒वा द॑धिरे हव्य॒वाह॑म् ॥४॥

अ॒ग्निः । ई॒शे॒ । बृ॒ह॒तः । अ॒ध्व॒रस्य॑ । अ॒ग्निः । विश्व॑स्य । ह॒विषः॑ । कृ॒तस्य॑ । क्रतु॑म् । हि । अ॒स्य॒ । वस॑वः । जु॒षन्त॑ । अथ॑ । दे॒वाः । द॒धि॒रे॒ । ह॒व्य॒ऽवाह॑म् ॥

Mantra without Swara
अग्निरीशे बृहतो अध्वरस्याग्निर्विश्वस्य हविषः कृतस्य। क्रतुं ह्यस्य वसवो जुषन्ताथा देवा दधिरे हव्यवाहम् ॥

अग्निः। ईशे। बृहतः। अध्वरस्य। अग्निः। विश्वस्य। हविषः। कृतस्य। क्रतुम्। हि। अस्य। वसवः। जुषन्त। अथ। देवाः। दधिरे। हव्यऽवाहम् ॥४॥

Ashtak » 5 Adhyay » 2 Varga » 14 Mantra » 4

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Meaning
(अग्निः) विद्युत् अग्नि (बृहतः) बड़े (अध्वरस्य) रक्षा योग्य व्यवहार के करने को (ईशे) समर्थ है (अग्निः) अग्नि (कृतस्य) शुद्ध (विश्वस्य) सब (हविषः) सङ्ग करने योग्य व्यवहार के लिये समर्थ है (अस्य) इस अग्नि के सङ्ग से जो (वसवः) चौबीस वर्ष ब्रह्मचर्य्य करनेवाले प्रथम कक्षा (देवाः) विद्वान् जन (क्रतुम्) बुद्धि का (हि) ही (जुषन्त) सेवन करते हैं (अथा) इसके अनन्तर (हव्यवाहम्) ग्रहण करने योग्य वस्तुओं को प्राप्त करनेवाले अग्नि को (दधिरे) धारण करते हैं, वे ही जगत् में पूज्य होते हैं ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो विद्युत् बड़े-बड़े कार्य्यों को सिद्ध करती, जिसके सम्बन्ध से योगाभ्यास कर के मनुष्य बुद्धि को प्राप्त होता, उसी अग्नि का सब लोग युक्ति से सेवन करें ॥४॥
Subject
किसकी विद्या से अभीष्ट प्राप्त करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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