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Rigveda Mandal 7 / Sukta 1 / Mantra 21

104 Sukta
25 Mantra
7/1/21
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वम॑ग्ने सु॒हवो॑ र॒ण्वसं॑दृक्सुदी॒ती सू॑नो सहसो दिदीहि। मा त्वे सचा॒ तन॑ये॒ नित्य॒ आ ध॒ङ्मा वी॒रो अ॒स्मन्नर्यो॒ वि दा॑सीत् ॥२१॥

त्वम् । अ॒ग्ने॒ । सु॒ऽहवः॑ । र॒ण्वऽस॑न्दृक् । सु॒ऽदी॒ती । सू॒नो॒ इति॑ । स॒ह॒सः॒ । दि॒दी॒हि॒ । मा । त्वे इति॑ । सचा॑ । तन॑ये । नित्ये॑ । आ । ध॒क् । मा । वी॒रः । अ॒स्मत् । नर्यः॑ । वि । दा॒सी॒त् ॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने सुहवो रण्वसंदृक्सुदीती सूनो सहसो दिदीहि। मा त्वे सचा तनये नित्य आ धङ्मा वीरो अस्मन्नर्यो वि दासीत् ॥

त्वम्। अग्ने। सुऽहवः। रण्वऽसन्दृक्। सुऽदीती। सूनो इति। सहसः। दिदीहि। मा। त्वे इति। सचा। तनये। नित्ये। आ। धक्। मा। वीरः। अस्मत्। नर्यः। वि। दासीत् ॥२१॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 27 Mantra » 1

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Meaning
हे (सहसः) बलवान् के (सूनो) पुत्र (अग्ने) अग्नि के तुल्य विद्या से प्रकाशमान विद्वन् ! (सुहवः) सुन्दर स्तुतियुक्त (रण्वसंदृक्) रमणीय सम्यक् देखनेवाला जैसे (नर्यः) मनुष्यों में उत्तम (वीरः) वीर (अस्मत्) हम से (मा) मत (वि, दासीत्) दान से रहित हो वा (नित्ये) सब काल में करने योग्य कर्म में (त्वे) आप (तनये) सन्तान में (सचा) सम्बन्ध से (मा, आ, धक्) अच्छे प्रकार मत जलाइये, वैसे (त्वम्) आप (सुदीती) उत्तम दीप्ति से हमको (दिदीहि) प्रकाशित कीजिये ॥२१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो ! जैसे हमारे बन्धु लोग हमारे विरोधी नहीं होते, जैसे माता में पुत्र, पुत्र के विषय में माता प्रेम के साथ वर्त्तती है, वैसे ही आप भी हमारे साथ वर्तिये ॥२१॥
Subject
फिर विद्वान् इस जगत् में कैसे वर्ते, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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