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Rigveda Mandal 7 / Sukta 1 / Mantra 10

104 Sukta
25 Mantra
7/1/10
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मे नरो॑ वृत्र॒हत्ये॑षु॒ शूरा॒ विश्वा॒ अदे॑वीर॒भि स॑न्तु मा॒याः। ये मे॒ धियं॑ प॒नय॑न्त प्रश॒स्ताम् ॥१०॥

इ॒मे । नरः॑ । वृ॒त्र॒ऽहत्ये॑षु । शूराः॑ । विश्वाः॑ । अदे॑वीः । अ॒भि । स॒न्तु॒ । मा॒याः । ये । मे॒ । धिय॑म् । प॒नय॑न्त । प्र॒ऽश॒स्ताम् ॥

Mantra without Swara
इमे नरो वृत्रहत्येषु शूरा विश्वा अदेवीरभि सन्तु मायाः। ये मे धियं पनयन्त प्रशस्ताम् ॥

इमे। नरः। वृत्रऽहत्येषु। शूराः। विश्वाः। अदेवीः। अभि। सन्तु। मायाः। ये। मे। धियम्। पनयन्त। प्रऽशस्ताम् ॥१०॥

Ashtak » 5 Adhyay » 1 Varga » 24 Mantra » 5

Bhashya

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Meaning
हे राजन् ! (ये) जो (इमे) वर्त्तमान (शूराः) शूरवीर (नरः) न्याययुक्त पुरुष (वृत्रहत्येषु) संग्रामों में (विश्वाः) समस्त (अदेवीः) अशुद्ध (मायाः) कपट छलयुक्त बुद्धियों को निवृत्त करके (मे) मेरी (प्रशस्ताम्) प्रशंसित (धियम्) उत्तम बुद्धि का (अभि, पनयन्त) सम्मुख स्तुति वा व्यवहार करते हैं, वे आपके कार्य्य करनेवाले (सन्तु) हों ॥१०॥
Essence
हे राजन् ! जो शत्रुओं के छलों से ठगे हुए न हों, संग्रामों में उत्साह को प्राप्त, शूरतायुक्त युद्ध करें, सब ओर से गुणों को ग्रहण कर दोषों को त्यागें, वे ही आपके मन्त्री हों ॥१०॥
Subject
राजा को कैसे मन्त्री करने चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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