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Rigveda Mandal 6 / Sukta 50 / Mantra 14

75 Sukta
15 Mantra
6/50/14
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- ऋजिश्वाः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒त नोऽहि॑र्बु॒ध्न्यः॑ शृणोत्व॒ज एक॑पात्पृथि॒वी स॑मु॒द्रः। विश्वे॑ दे॒वा ऋ॑ता॒वृधो॑ हुवा॒नाः स्तु॒ता मन्त्राः॑ कविश॒स्ता अ॑वन्तु ॥१४॥

उ॒त । नः॒ । अहिः॑ । बु॒ध्न्यः॑ । शृ॒णो॒तु॒ । अ॒जः । एक॑ऽपात् । पृ॒थि॒वी । स॒मु॒द्रः । विश्वे॑ । दे॒वाः । ऋ॒त॒ऽवृधः॑ । हु॒वा॒नाः । स्तु॒ताः । मन्त्राः॑ । क॒वि॒ऽश॒स्ताः । अ॒व॒न्तु॒ ॥

Mantra without Swara
उत नोऽहिर्बुध्न्यः शृणोत्वज एकपात्पृथिवी समुद्रः। विश्वे देवा ऋतावृधो हुवानाः स्तुता मन्त्राः कविशस्ता अवन्तु ॥

उत। नः। अहिः। बुध्न्यः। शृणोतु। अजः। एकऽपात्। पृथिवी। समुद्रः। विश्वे। देवाः। ऋतऽवृधः। हुवानाः। स्तुताः। मन्त्राः। कविऽशस्ताः। अवन्तु ॥१४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 10 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! वह (एकपात्) जिसका जगत् में एक पाद है (अजः) जो कभी नहीं उत्पन्न होता वह परमात्मा (नः) हमारी उस प्रार्थना को (शृणोतु) सुने जिसने (बुध्न्यः) अन्तरिक्ष में होनेवाला (अहिः) मेघ (पृथिवी) भूमि (समुद्रः) अन्तरिक्ष (उत) और (ऋतावृधः) सत्य के बढ़ानेवाला (हुवानाः) और आह्वान करनेवाले तथा (विश्वे, देवाः) समस्त विद्वान् (कविशस्ताः) कवि मेधावी जनों से प्रशंसित वा पढ़ाये हुए और (स्तुताः) प्रशंसित (मन्त्राः) वेद की श्रुति वा वेदविचार हम लोगों की (अवन्तु) रक्षा करें ॥१४॥
Essence
हे मनुष्यो ! तुम-जो जन्म-मरणादि व्यवहार से रहित जगदीश्वर है, उसकी कृपा और पुरुषार्थ से तथा सम्पूर्ण पृथिवी आदि पदार्थों के विज्ञान से अपनी उन्नति निरन्तर करो ॥१४॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या आकाङ्क्षा करने योग्य है, इस विषय को कहते हैं ॥

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