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Rigveda Mandal 6 / Sukta 48 / Mantra 8

75 Sukta
22 Mantra
6/48/8
Devata- अग्निः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
विश्वा॑सां गृ॒हप॑तिर्वि॒शाम॑सि॒ त्वम॑ग्ने॒ मानु॑षीणाम्। श॒तं पू॒र्भिर्य॑विष्ठ पा॒ह्यंह॑सः समे॒द्धारं॑ श॒तं हिमाः॑ स्तो॒तृभ्यो॒ ये च॒ दद॑ति ॥८॥

विश्वा॑साम् । गृ॒हऽप॑तिः । वि॒शाम् । अ॒सि॒ । त्वम् । अ॒ग्ने॒ । मानु॑षीणाम् । श॒तम् । पूः॒ऽभिः । य॒वि॒ष्ठ॒ । पा॒हि॒ । अंह॑सः । स॒म्ऽए॒द्धार॑म् । श॒तम् । हिमाः॑ । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । ये । च॒ । दद॑ति ॥

Mantra without Swara
विश्वासां गृहपतिर्विशामसि त्वमग्ने मानुषीणाम्। शतं पूर्भिर्यविष्ठ पाह्यंहसः समेद्धारं शतं हिमाः स्तोतृभ्यो ये च ददति ॥

विश्वासाम्। गृहऽपतिः। विशाम्। असि। त्वम्। अग्ने। मानुषीणाम्। शतम्। पूःऽभिः। यविष्ठ। पाहि। अंहसः। सम्ऽएद्धारम्। शतम्। हिमाः। स्तोतृऽभ्यः। ये। च। ददति ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 2 Mantra » 3

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Meaning
हे (यविष्ठ) शरीर और आत्मा के बल से युक्त (अग्ने) दुष्टों के दाह करनेवाले ! (ये) जो (स्तोतृभ्यः) स्तुति करनेवाले विद्वानों से (शतम्) सौ (हिमाः) वृद्धि वा हेमन्त आदि ऋतुओं तक (समेद्धारम्) अच्छे प्रकार प्रकाश करनेवाले को (ददति) देते (च) और शुभ गुणों को ग्रहण कर दूसरों को देते हैं, उनके साथ युक्त (विश्वासाम्) समस्त (मानुषीणाम्) मनुष्य सम्बन्धी (विशाम्) प्रजाजनों के बीच जिससे (त्वम्) आप (गृहपतिः) धन के स्वामी (असि) हैं वा (पूर्भिः) नगरों के साथ इनके लिये (शतम्) सौ पदार्थ देते हैं, इस कारण हम लोगों की (अंहसः) दुष्ट आचरण से (पाहि) रक्षा करो ॥८॥
Essence
हे राजन् ! जो इस प्रजा में विद्या और धर्म आदि शुभ गुणों को ग्रहण कराते हैं, उनका तुम निरन्तर सत्कार करो और वे आपका भी सत्कार करें ॥८॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

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