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Rigveda Mandal 6 / Sukta 48 / Mantra 5

75 Sukta
22 Mantra
6/48/5
Devata- अग्निः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
यमापो॒ अद्र॑यो॒ वना॒ गर्भ॑मृ॒तस्य॒ पिप्र॑ति। सह॑सा॒ यो म॑थि॒तो जाय॑ते॒ नृभिः॑ पृथि॒व्या अधि॒ सान॑वि ॥५॥

यम् । आपः॑ । अद्र॑यः । वना॑ । गर्भ॑म् । ऋ॒तस्य॑ । पिप्र॑ति । सह॑सा । यः । म॒थि॒तः । जाय॑ते । नृऽभिः॑ । पृ॒थि॒व्याः । अधि॑ । सान॑वि ॥

Mantra without Swara
यमापो अद्रयो वना गर्भमृतस्य पिप्रति। सहसा यो मथितो जायते नृभिः पृथिव्या अधि सानवि ॥

यम्। आपः। अद्रयः। वना। गर्भम्। ऋतस्य। पिप्रति। सहसा। यः। मथितः। जायते। नृऽभिः। पृथिव्याः। अधि। सानवि ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 1 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यम्) जिस (ऋतस्य) जल के (गर्भम्) गर्भरूप संसार को (आपः) जल (अद्रयः) मेघ और (वना) किरण (पिप्रति) पूरण करते हैं और (यः) जो (नृभिः) नायक मनुष्यों से (सहसा) बल से (मथितः) मथा हुआ (पृथिव्याः) पृथिवी के (अधि) ऊपर (सानवि) पर्वत के शिखर पर (जायते) प्रसिद्ध होता है, उस अग्नि को तुम अच्छे प्रकार युक्त करो ॥५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो सब में व्याप्त होकर रहनेवाले अग्नि को विद्वान् जन प्राप्त होते और मथि के प्रदीप्त करते हैं, वे भूमि के राज्य करने में अधिष्ठाता होते हैं ॥५॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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