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Rigveda Mandal 6 / Sukta 48 / Mantra 4

75 Sukta
22 Mantra
6/48/4
Devata- अग्निः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
म॒हो दे॒वान्यज॑सि॒ यक्ष्या॑नु॒षक्तव॒ क्रत्वो॒त दं॒सना॑। अ॒र्वाचः॑ सीं कृणुह्य॒ग्नेऽव॑से॒ रास्व॒ वाजो॒त वं॑स्व ॥४॥

म॒हः । दे॒वान् । यज॑सि । यक्षि॑ । आ॒नु॒षक् । तव॑ । क्रत्वा॑ । उ॒त । दं॒सना॑ । अ॒र्वाचः॑ । सी॒म् । कृ॒णु॒हि॒ । अ॒ग्ने॒ । अव॑से । रास्व॑ । वाजा॑ । उ॒त । वं॒स्व॒ ॥

Mantra without Swara
महो देवान्यजसि यक्ष्यानुषक्तव क्रत्वोत दंसना। अर्वाचः सीं कृणुह्यग्नेऽवसे रास्व वाजोत वंस्व ॥

महः। देवान्। यजसि। यक्षि। आनुषक्। तव। क्रत्वा। उत। दंसना। अर्वाचः। सीम्। कृणुहि। अग्ने। अवसे। रास्व। वाजा। उत। वंस्व ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 1 Mantra » 4

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान वर्त्तमान राजन् ! आप (अर्वाचः) जो प्राप्त होते उन (महः) महान् अत्युत्तम महात्मा (देवान्) विद्वान् जनों से (यजसि) सङ्गत होते हैं और (आनुषक्) अनुकूलता में (दंसना) कर्मों को (यक्षि) सङ्गत करते हैं उन (तव) आपकी (क्रत्वा) प्रज्ञा से हम लोग उनको सङ्गत करें (उत) और (अवसे) रक्षा के अर्थ हम लोगों के लिये (रास्व) दीजिये और (सीम्) सब ओर से सुख (कृणुहि) कीजिये (उत) और (वाजा) अन्नों का (वंस्व) सेवन कीजिये ॥४॥
Essence
जो मूर्खों को विद्वान् करते हैं, वे महत् अनुकूल सुख को प्राप्त होते हैं ॥४॥
Subject
फिर वह राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

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