Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 6 / Sukta 48 / Mantra 1

75 Sukta
22 Mantra
6/48/1
Devata- अग्निः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
य॒ज्ञाय॑ज्ञा वो अ॒ग्नये॑ गि॒रागि॑रा च॒ दक्ष॑से। प्रप्र॑ व॒यम॒मृतं॑ जा॒तवे॑दसं प्रि॒यं मि॒त्रं न शं॑सिषम् ॥१॥

य॒ज्ञाऽय॑ज्ञा । वः॒ । अ॒ग्नये॑ । गि॒राऽगि॑रा । च॒ । दक्ष॑से । प्रऽप्र॑ । व॒यम् । अ॒मृत॑म् । जा॒तऽवे॑दसम् । प्रि॒यम् । मि॒त्रम् । न । शं॒सि॒ष॒म् ॥

Mantra without Swara
यज्ञायज्ञा वो अग्नये गिरागिरा च दक्षसे। प्रप्र वयममृतं जातवेदसं प्रियं मित्रं न शंसिषम् ॥

यज्ञाऽयज्ञा। वः। अग्नये। गिराऽगिरा। च। दक्षसे। प्रऽप्र। वयम्। अमृतम्। जातऽवेदसम्। प्रियम्। मित्रम्। न। शंसिषम् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 8 Varga » 1 Mantra » 1

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे विद्वान् जनो ! (वः) आपके (यज्ञायज्ञा) यज्ञ-यज्ञ में (गिरागिरा, च) और वाणी-वाणी से (अग्नये) अग्नि (दक्षसे) जो कि विलक्षण है, उसके लिये (वयम्) हम लोग प्रयत्न करें। और (अमृतम्) नाश से रहित (जातवेदसम्) जातवेदस् अर्थात् जिससे विद्या उत्पन्न हुई ऐसे अग्नि (प्रियम्) मनोहर (मित्रम्) मित्र के (न) समान तुम लोगों की मैं जैसे (प्रप्र, शंसिषम्) वार-वार प्रशंसा करूँ, वैसे आप भी हम लोगों की प्रशंसा कीजिये ॥१॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे विद्वान् जन आप लोगों की प्रीति उत्पन्न करें, वैसे आप भी हमारे कार्य साधने के लिये प्रीति उत्पन्न कीजिये ॥१॥
Subject
अब चतुर्थाष्टक के अष्टमाध्याय का आरम्भ है, इसमें बाईस ऋचावाले अड़तालीसवें सूक्त के प्रथम मन्त्र में विद्वानों को क्या करना चाहिये, इस विषय का वर्णन करते हैं ॥

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.