Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 6 / Sukta 45 / Mantra 16

75 Sukta
33 Mantra
6/45/16
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य एक॒ इत्तमु॑ ष्टुहि कृष्टी॒नां विच॑र्षणिः। पति॑र्ज॒ज्ञे वृष॑क्रतुः ॥१६॥

यः । एकः॑ । इत् । तम् । ऊँ॒ इति॑ । स्तु॒हि॒ । कृ॒ष्टी॒नाम् । विऽच॑र्षणिः । पतिः॑ । ज॒ज्ञे । वृष॑ऽक्रतुः ॥

Mantra without Swara
य एक इत्तमु ष्टुहि कृष्टीनां विचर्षणिः। पतिर्जज्ञे वृषक्रतुः ॥

यः। एकः। इत्। तम्। ऊँ इति। स्तुहि। कृष्टीनाम्। विऽचर्षणिः। पतिः। जज्ञे। वृषऽक्रतुः ॥१६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 24 Mantra » 1

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे मनुष्य ! (यः) जो (एकः) सहायरहित (इत्) ही (कृष्टीनाम्) मनुष्यों का (पतिः) स्वामी (विचर्षणिः) देखनेवाला (वृषक्रतुः) बलयुक्त बुद्धिवाला (जज्ञे) होता है (तम्) उस वीर पुरुष की (उ) ही (स्तुहि) प्रशंसा करिये ॥१६॥
Essence
हे प्रजाजनो ! जो सम्पूर्ण विद्या और श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभाववाला निरन्तर न्याय से प्रजाओं के पालन में तत्पर होवे, उसको राजा मानो, दूसरे क्षुद्राशय को नहीं ॥१६॥
Subject
फिर वह राजा कैसा होवे, इस विषय को कहते हैं ॥

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.