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Rigveda Mandal 6 / Sukta 44 / Mantra 2

75 Sukta
24 Mantra
6/44/2
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- स्वराडुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
यः श॒ग्मस्तु॑विशग्म ते रा॒यो दा॒मा म॑ती॒नाम्। सोमः॑ सु॒तः स इ॑न्द्र॒ तेऽस्ति॑ स्वधापते॒ मदः॑ ॥२॥

यः । श॒ग्मः । तु॒वि॒ऽश॒ग्म॒ । ते॒ । रा॒यः । दा॒मा । म॒ती॒नाम् । सोमः॑ । सु॒तः । सः । इ॒न्द्र॒ । ते॒ । अस्ति॑ । स्व॒धा॒ऽप॒ते॒ मदः॑ ॥

Mantra without Swara
यः शग्मस्तुविशग्म ते रायो दामा मतीनाम्। सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापते मदः ॥

यः। शग्मः। तुविऽशग्म। ते। रायः। दामा। मतीनाम्। सोमः। सुतः। सः। इन्द्र। ते। अस्ति। स्वधाऽपते मदः ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 16 Mantra » 2

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Meaning
हे (तुविशग्म) अनेक प्रकार के सुखोंवाले (स्वधापते) अन्न आदिकों के स्वामिन् (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त ! (यः) जो (ते) आपका (शग्मः) सुखयुक्त (रायः) धनों को (मतीनाम्) विचारशीलों को (दामा) देने योग्य (सुतः) उत्पन्न किया गया (मदः) आनन्दकारक (सोमः) ऐश्वर्य्यों का समूह (अस्ति) है (सः) वह (ते) आपके धर्म्म की कीर्ति करनेवाला हो ॥२॥
Essence
जो मनुष्य धन आदि ऐश्वर्य्य से धर्म्म और विद्या की उन्नति करते हैं, वे ही बहुत सुख और धनवाले होते हैं ॥२॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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