Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 6 / Sukta 44 / Mantra 17

75 Sukta
24 Mantra
6/44/17
Devata- इन्द्र: Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒ना म॑न्दा॒नो ज॒हि शू॑र॒ शत्रू॑ञ्जा॒मिमजा॑मिं मघवन्न॒मित्रा॑न्। अ॒भि॒षे॒णाँ अ॒भ्या॒३॒॑देदि॑शाना॒न्परा॑च इन्द्र॒ प्र मृ॑णा ज॒ही च॑ ॥१७॥

ए॒ना । म॒न्दा॒नः । ज॒हि । शू॒र॒ । शत्रू॑न् । जा॒मिम् । अजा॑मिम् । म॒घ॒ऽव॒न् । अ॒मित्रा॑न् । अ॒भि॒ऽसे॒नान् । अ॒भि । आ॒ऽदेदि॑शानान् । परा॑चः । इ॒न्द्र॒ । प्र । मृ॒ण॒ । ज॒हि । च॒ ॥

Mantra without Swara
एना मन्दानो जहि शूर शत्रूञ्जामिमजामिं मघवन्नमित्रान्। अभिषेणाँ अभ्या३देदिशानान्पराच इन्द्र प्र मृणा जही च ॥

एना। मन्दानः। जहि। शूर। शत्रून्। जामिम्। अजामिम्। मघऽवन्। अमित्रान्। अभिऽसेनान्। अभि। आऽदेदिशानान्। पराचः। इन्द्र। प्र। मृण। जहि। च ॥१७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 19 Mantra » 2

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे (शूर) दुष्टों को मारनेवाले (मघवन्) बहुत धनों से युक्त (इन्द्र) दुष्टों के विदारक ! आप (एना) इससे (मन्दानः) प्रशंसित हुए (जामिम्) जवाँई आदि को (अजामिम्) दूसरी सम्बन्ध रहित को (शत्रून्) धर्म्म के विरोधियों (अमित्रान्) मित्रभावरहित वैरियों का (जहि) त्याग करो (अभिषेणान्) सन्मुख सेना जिनकी उन (आदेदिशानान्) अत्यन्त आज्ञा करनेवाले (पराचः) पश्चिम की ओर अर्थात् पीछे मुख किये हुओं की (अभि, प्र, मृणा) बाधा करो (च) और अविद्या आदि दोषों का (जही) त्याग करो ॥१७॥
Essence
हे राजन् सेना के स्वामिन् ! आप ब्रह्मचर्य और सोमलता के रस के पान आदि से स्वयं आनन्दित हुए वीरों को आनन्द देकर सम्पूर्ण शत्रुओं को जीतो ॥१७॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.