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Rigveda Mandal 6 / Sukta 43 / Mantra 2

75 Sukta
4 Mantra
6/43/2
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
यस्य॑ तीव्र॒सुतं॒ मदं॒ मध्य॒मन्तं॑ च॒ रक्ष॑से। अ॒यं स सोम॑ इन्द्र ते सु॒तः पिब॑ ॥२॥

यस्य॑ । ती॒व्र॒ऽसुत॑म् । मद॑म् । मध्य॑म् । अन्त॑म् । च॒ । रक्ष॑से । अ॒यम् । सः । सोमः॑ । इ॒न्द्र॒ । ते॒ । सु॒तः । पिब॑ ॥

Mantra without Swara
यस्य तीव्रसुतं मदं मध्यमन्तं च रक्षसे। अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब ॥

यस्य। तीव्रऽसुतम्। मदम्। मध्यम्। अन्तम्। च। रक्षसे। अयम्। सः। सोमः। इन्द्र। ते। सुतः। पिब ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 7 Varga » 15 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) बल के देनेवाले (यस्य) जिसके (तीव्रसुतम्) तेजस्वियों से कर्म्मों द्वारा उत्पन्न किये (मदम्) आनन्द के देनेवाले (मध्यम्) मध्य में हुए (अन्तम्) और अन्त में वर्त्तमान की (च) भी (रक्षसे) रक्षा करते हो (सः) वह (अयम्) यह (सोमः) उत्तम ओषधियों का रस (ते) आपके लिये (सुतः) उत्पन्न किया उसका आप (पिब) पान करिये ॥२॥
Essence
हे विद्यायुक्त राजन् ! आप वैसी ही ओषधियों को प्रकट करिये जिससे सब का सुख बढ़े ॥२॥
Subject
फिर राजा क्या करे, इस विषय को कहते हैं ॥

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