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Rigveda Mandal 6 / Sukta 26 / Mantra 5

75 Sukta
8 Mantra
6/26/5
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं तदु॒क्थमि॑न्द्र ब॒र्हणा॑ कः॒ प्र यच्छ॒ता स॒हस्रा॑ शूर॒ दर्षि॑। अव॑ गि॒रेर्दासं॒ शम्ब॑रं ह॒न्प्रावो॒ दिवो॑दासं चि॒त्राभि॑रू॒ती ॥५॥

त्वम् । तत् । उ॒क्थम् । इ॒न्द्र॒ । ब॒र्हणा॑ । क॒रिति॑ कः । प्र । य॒त् । श॒ता । स॒हस्रा॑ । शू॒र॒ । दर्षि॑ । अव॑ । गि॒रेः । दास॑म् । शम्ब॑रम् । ह॒न् । प्र । आ॒वः॒ । दिवः॑ऽदासम् । चि॒त्राभिः॑ । ऊ॒ती ॥

Mantra without Swara
त्वं तदुक्थमिन्द्र बर्हणा कः प्र यच्छता सहस्रा शूर दर्षि। अव गिरेर्दासं शम्बरं हन्प्रावो दिवोदासं चित्राभिरूती ॥

त्वम्। तत्। उक्थम्। इन्द्र। बर्हणा। करिति कः। प्र। यत्। शता। सहस्रा। शूर। दर्षि। अव। गिरेः। दासम्। शम्बरम्। हन्। प्र। आवः। दिवःऽदासम्। चित्राभिः। ऊती ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 21 Mantra » 5

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Meaning
हे (इन्द्र) सुख के देनेवाले राजन् ! (यत्) जिससे (त्वम्) आप (चित्राभिः) अद्भुत (ऊती) रक्षाओं से (तत्) उस (उक्थम्) प्रशंसनीय वचन को (बर्हणा) बढ़ने से (कः) करें और हे (शूर) शत्रुओं के नाश करनेवाले ! (शता) सैकड़ों और (सहस्रा) हजारों का (प्र, दर्षि) नाश करते हो और (गिरेः) मेघ के (दासम्) सेवक और (शम्बरम्) कल्याण करनेवाले का (अव, हन्) और सूर्य जैसे वैसे नाश करते हो वह आप (दिवोदासम्) प्रकाश के समान उत्पन्न दानशील अर्थात् दान देनेवाले की (प्र, आवः) रक्षा करो ॥५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजन् ! आप सर्वदा प्रजा की वृद्धि, दुष्टों का नाश और विद्वानों की सेवा करो, जिससे असङ्ख्य सुख होवे ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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