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Rigveda Mandal 6 / Sukta 2 / Mantra 3

75 Sukta
11 Mantra
6/2/3
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स॒जोष॑स्त्वा दि॒वो नरो॑ य॒ज्ञस्य॑ के॒तुमि॑न्धते। यद्ध॒ स्य मानु॑षो॒ जनः॑ सुम्ना॒युर्जु॒ह्वे अ॑ध्व॒रे ॥३॥

स॒ऽजोषः॑ । त्वा॒ । दि॒वः । नरः॑ । य॒ज्ञस्य॑ । के॒तुम् । इ॒न्ध॒ते॒ । यत् । ह॒ । स्य । मानु॑षः । जनः॑ । सु॒म्न॒ऽयुः । जु॒ह्वे । अ॒ध्व॒रे ॥

Mantra without Swara
सजोषस्त्वा दिवो नरो यज्ञस्य केतुमिन्धते। यद्ध स्य मानुषो जनः सुम्नायुर्जुह्वे अध्वरे ॥

सऽजोषः। त्वा। दिवः। नरः। यज्ञस्य। केतुम्। इन्धते। यत्। ह। स्य। मानुषः। जनः। सुम्नऽयुः। जुह्वे। अध्वरे ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 1 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वान् ! (सजोषः) तुल्य प्रीति के सेवन करनेवाले (दिवः) सत्य की कामना करते हुए (नरः) नायक जन (यज्ञस्य) न्यायव्यवहार की (केतुम्) बुद्धि को और (त्वा) आपको (इन्धते) प्रकाशित करते हैं और (यत्) जिससे (ह) निश्चय करके (स्यः) वह (मानुषः) विचारशील और (सुम्नायुः) सुख की कामना करनेवाले (जनः) प्रसिद्ध मनुष्य आप (अध्वरे) अहिंसारूप में वर्त्तमान होते हो, उसकी मैं (जुह्वे) स्पर्द्धा करता हूँ ॥३॥
Essence
उसी का सङ्ग मनुष्यों को करना चाहिये, जिसकी धार्मिक विद्वान् जन प्रशंसा करें ॥३॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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