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Rigveda Mandal 6 / Sukta 17 / Mantra 11

75 Sukta
15 Mantra
6/17/11
Devata- इन्द्र: Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वर्धा॒न्यं विश्वे॑ म॒रुतः॑ स॒जोषाः॒ पच॑च्छ॒तं म॑हि॒षाँ इ॑न्द्र॒ तुभ्य॑म्। पू॒षा विष्णु॒स्त्रीणि॒ सरां॑सि धावन्वृत्र॒हणं॑ मदि॒रमं॒शुम॑स्मै ॥११॥

वर्धा॑न् । यम् । विश्वे॑ । म॒रुतः॑ । स॒ऽजोषाः॑ । पच॑त् । श॒तम् । म॒हि॒षान् । इ॒न्द्र॒ । तुभ्य॑म् । पू॒षा । विष्णुः॑ । त्रीणि॑ । सरां॑सि । धा॒व॒न् । वृ॒त्र॒ऽहन॑म् । म॒दि॒रम् । अं॒शुम् । अ॒स्मै॒ ॥

Mantra without Swara
वर्धान्यं विश्वे मरुतः सजोषाः पचच्छतं महिषाँ इन्द्र तुभ्यम्। पूषा विष्णुस्त्रीणि सरांसि धावन्वृत्रहणं मदिरमंशुमस्मै ॥

वर्धान्। यम्। विश्वे। मरुतः। सऽजोषाः। पचत्। शतम्। महिषान्। इन्द्र। तुभ्यम्। पूषा। विष्णुः। त्रीणि। सरांसि। धावन्। वृत्रऽहनम्। मदिरम्। अंशुम्। अस्मै ॥११॥

Ashtak » 4 Adhyay » 6 Varga » 3 Mantra » 1

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Meaning
हे (इन्द्र) सूर्य्य के समान वर्त्तमान राजन् ! (सजोषाः) तुल्य प्रीति के सेवनेवाले (विश्वे) सम्पूर्ण (मरुतः) मनुष्य (यम्) जिन आपकी (वर्धान्) वृद्धि करें और जो (पूषा) पुष्टि करनेवाला (धावन्) दौड़ता हुआ (विष्णुः) व्यापक बिजुलीरूप (त्रीणि) तीन (सरांसि) चलते हैं जिनमें उन अन्तरिक्ष आदिकों को व्याप्त होता है, वैसे दौड़ते हुए (अस्मै) इसके लिये (मदिरम्) आनन्द करनेवाले (अंशुम्) विभक्त (वृत्रहणम्) मेघ को जैसे सूर्य्य, वैसे शत्रुओं का मारता है और जो (तुभ्यम्) आपके लिये (शतम्) सौ (महिषान्) बड़े पदार्थों को देता है और जो परोपकार के लिये (पचत्) पाक करे, उसको आप लोग जानिये ॥११॥
Essence
जैसे प्रजाजन राजा और राज्य को बढ़ावें, वैसे राजा इनकी निरन्तर वृद्धि करे ॥११॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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