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Rigveda Mandal 6 / Sukta 11 / Mantra 3

75 Sukta
6 Mantra
6/11/3
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
धन्या॑ चि॒द्धि त्वे धि॒षणा॒ वष्टि॒ प्र दे॒वाञ्जन्म॑ गृण॒ते यज॑ध्यै। वेपि॑ष्ठो॒ अङ्गि॑रसां॒ यद्ध॒ विप्रो॒ मधु॑च्छ॒न्दो भन॑ति रे॒भ इ॒ष्टौ ॥३॥

धन्या॑ । चि॒त् । हि । त्वे इति॑ । धि॒षणा॑ । वष्टि॑ । प्र । दे॒वान् । जन्म॑ । गृ॒ण॒ते । यज॑ध्यै । वेपि॑ष्ठः । अङ्गि॑रसाम् । यत् । ह॒ । विप्रः॑ । मधु॑ । छ॒न्दः । भन॑ति । रे॒भः । इ॒ष्टौ ॥

Mantra without Swara
धन्या चिद्धि त्वे धिषणा वष्टि प्र देवाञ्जन्म गृणते यजध्यै। वेपिष्ठो अङ्गिरसां यद्ध विप्रो मधुच्छन्दो भनति रेभ इष्टौ ॥

धन्या। चित्। हि। त्वे इति। धिषणा। वष्टि। प्र। देवान्। जन्म। गृणते। यजध्यै। वेपिष्ठः। अङ्गिरसाम्। यत्। ह। विप्रः। मधु। छन्दः। भनति। रेभः। इष्टौ ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 5 Varga » 13 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वन् ! जो (हि) निश्चित (त्वे) आपके रहते (धन्या) धन को प्राप्त हुई (धिषणा) बुद्धि, अन्तरिक्ष वा पृथिवी (देवान्) विद्वानों की (प्र, वष्टि) कामना करती है उन (अङ्गिरसाम्) प्राणों के सदृश विद्वनों के (जन्म) जन्म को (यजध्यै) उत्तम प्रकार प्राप्त होने को जो (गृणते) स्तुति करते हैं और (यत्) जो (ह) निश्चित (वेपिष्ठः) अतिशय कम्पानेवाला (विप्रः) बुद्धिमान् (रेभः) स्तुतिकर्त्ता (इष्टौ) विज्ञान के बढ़ानेवाले यज्ञ में (मधु) माधुर्य गुण से युक्त विज्ञान और (छन्दः) स्वतन्त्रता को (भनति) कहता है (चित्) उन्हीं सब को हम लोग ग्रहण करें ॥३॥
Essence
जो बुद्धि और विद्वानों के सङ्ग से विद्या की कामना करते और अन्यों को उपदेश देते हैं, वे धन्य हैं ॥२ ॥
Subject
फिर वे कैसे होकर क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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