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Rigveda Mandal 5 / Sukta 77 / Mantra 2

87 Sukta
5 Mantra
5/77/2
Devata- अश्विनौ Rishi- अत्रिः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्रा॒तर्य॑जध्वम॒श्विना॑ हिनोत॒ न सा॒यम॑स्ति देव॒या अजु॑ष्टम्। उ॒तान्यो अ॒स्मद्य॑जते॒ वि चावः॒ पूर्वः॑पूर्वो॒ यज॑मानो॒ वनी॑यान् ॥२॥

प्रा॒तः । य॒ज॒ध्व॒म् । अ॒श्विना॑ । हि॒नो॒त॒ । न । सा॒यम् । अ॒स्ति॒ । दे॒व॒ऽयाः । अजु॑ष्टम् । उ॒त । अ॒न्यः । अ॒स्मत् । य॒ज॒ते॒ । वि । च॒ । आवः॒ । पूर्वः॑ऽपूर्वः । यज॑मानः । वनी॑यान् ॥

Mantra without Swara
प्रातर्यजध्वमश्विना हिनोत न सायमस्ति देवया अजुष्टम्। उतान्यो अस्मद्यजते वि चावः पूर्वःपूर्वो यजमानो वनीयान् ॥

प्रातः। यजध्वम्। अश्विना। हिनोत। न। सायम्। अस्ति। देवऽयाः। अजुष्टम्। उत। अन्यः। अस्मत्। यजते। वि। च। आवः। पूर्वःऽपूर्वः। यजमानः। वनीयान् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 18 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! आप लोग (प्रातः) प्रभातकाल में (अश्विना) सूर्य्य और उषा को (यजध्वम्) उत्तम प्रकार प्राप्त हूजिये और (हिनोत) वृद्धि कीजिये जहाँ (न) नहीं (सायम्) सन्ध्याकाल (अस्ति) है वहाँ जो (देवयाः) श्रेष्ठ गुण और विद्वानों को प्राप्त होनेवाले हैं उनका (अजुष्टम्) सेवन करिये और जो (अन्यः) अन्य (अस्मत्) हम लोगों से (यजते) मिलता है (च) और जो (वि, आवः) विशेष रक्षा करता है वह (उत) भी (पूर्वःपूर्वः) पहिला पहिला (यजमानः) यज्ञ करनेवाला (वनीयान्) अतिशय विभाग करनेवाला होता है, उसका भी सत्कार करो ॥२॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि प्रतिदिन रात्रि के चौथे शेष प्रहर में उठकर जैसे नियम से अन्तरिक्ष और पृथिवी वर्त्तमान हैं, वैसे वर्त्ताव करके सब की रक्षा करें ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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