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Rigveda Mandal 5 / Sukta 74 / Mantra 4

87 Sukta
10 Mantra
5/74/4
Devata- अश्विनौ Rishi- पौर आत्रेयः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पौ॒रं चि॒द्ध्यु॑द॒प्रुतं॒ पौर॑ पौ॒राय॒ जिन्व॑थः। यदीं॑ गृभी॒तता॑तये सिं॒हमि॑व द्रु॒हस्प॒दे ॥४॥

पौ॒रम् । चि॒त् । हि । उ॒द॒ऽप्रुत॑म् । पौर॑ । पौ॒राय॑ । जिन्व॑थः । यत् । ई॒म् । गृ॒भी॒तऽता॑तये । सिं॒हम्ऽइ॑व । द्रु॒हः । प॒दे ॥

Mantra without Swara
पौरं चिद्ध्युदप्रुतं पौर पौराय जिन्वथः। यदीं गृभीततातये सिंहमिव द्रुहस्पदे ॥

पौरम्। चित्। हि। उदऽप्रुतम्। पौर। पौराय। जिन्वथः। यत्। ईम्। गृभीतऽतातये। सिंहम्ऽइव। द्रुहः। पदे ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 13 Mantra » 4

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Meaning
हे (पौर) पुर में हुए ! आप (हि) ही (उदप्रुतम्) जल से युक्त (पौरम्) मनुष्य के सन्तान को (चित्) निश्चय से प्राप्त हूजिये और (पौराय) पुर में हुए मनुष्य के लिये अध्यापक और आप (जिन्वथः) प्राप्त होते हो (गृभीततातये) ग्रहण किया श्रेष्ठ कर्म्मों का विस्तार जिसने उसके लिये (द्रुहः) शत्रु के (पदे) प्राप्त होने योग्य स्थान में (सिंहमिव) सिंह के सदृश (यत्) जिसको (ईम्) सब ओर से प्राप्त होते हो, उसको आप सन्तुष्ट कीजिये ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! जैसे एक नगर के वासी जन परस्पर सुख की उन्नति करते हैं, वैसे ही अन्य देशवासी भी करें ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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