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Rigveda Mandal 5 / Sukta 70 / Mantra 4

87 Sukta
4 Mantra
5/70/4
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- उरूचक्रिरात्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
मा कस्या॑द्भुतक्रतू य॒क्षं भु॑जेमा त॒नूभिः॑। मा शेष॑सा॒ मा तन॑सा ॥४॥

मा । कस्य॑ । अ॒द्भु॒त॒क्र॒तू॒ इत्य॑द्भुतऽक्रतू । य॒क्षम् । भु॒जे॒म॒ । त॒नूभिः॑ । मा । शेष॑सा । मा । तन॑सा ॥

Mantra without Swara
मा कस्याद्भुतक्रतू यक्षं भुजेमा तनूभिः। मा शेषसा मा तनसा ॥

मा। कस्य। अद्भुतक्रतू इत्यद्भुतऽक्रतू। यक्षम्। भुजेम। तनूभिः। मा। शेषसा। मा। तनसा ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 8 Mantra » 4

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Meaning
हे (अद्भुतक्रतू) अद्भुत बुद्धि वा कर्मवालो ! हम लोग (तनूभिः) शरीरों से (कस्य) किसी के (यक्षम्) दान का (मा) नहीं (भुजेम) सेवन करें और (शेषसा) अन्यों के साथ वर्त्तमान हुए (मा) नहीं पालन करें और (तनसा) पौत्र आदि के सहित (मा) नहीं पालन करें ॥४॥
Essence
विद्वान् जन ऐसा उपदेश करें जिससे कि किसी से दान कोई भी नहीं ग्रहण करे, वैसे ही माता और पिता से पुत्र, पौत्र आदि भी दान की रुचि न करें ॥४॥ इस सूक्त में प्राण उदान और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह सत्तरवाँ सूक्त और अष्टम वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
उत्तमों को किसी पुरुष से भी दान कभी न ग्रहण करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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