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Rigveda Mandal 5 / Sukta 7 / Mantra 2

87 Sukta
10 Mantra
5/7/2
Devata- अग्निः Rishi- इष आत्रेयः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
कुत्रा॑ चि॒द्यस्य॒ समृ॑तौ र॒ण्वा नरो॑ नृ॒षद॑ने। अर्ह॑न्तश्चि॒द्यमि॑न्ध॒ते सं॑ज॒नय॑न्ति ज॒न्तवः॑ ॥२॥

कुत्र॑ । चि॒त् । यस्य॑ । सम्ऽऋ॑तौ । र॒ण्वाः । नरः॑ । नृ॒ऽसद॑ने । अर्ह॑न्तः । चि॒त् । यम् । इ॒न्ध॒ते । स॒म्ऽज॒नय॑न्ति । ज॒न्तवः॑ ॥

Mantra without Swara
कुत्रा चिद्यस्य समृतौ रण्वा नरो नृषदने। अर्हन्तश्चिद्यमिन्धते संजनयन्ति जन्तवः ॥

कुत्र। चित्। यस्य। सम्ऽऋतौ। रण्वाः। नरः। नृऽसदने। अर्हन्तः। चित्। यम्। इन्धते। सम्ऽजनयन्ति। जन्तवः ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 24 Mantra » 2

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Meaning
हे (नरः) नायक अर्थात् कार्य्यों में अग्रगामी मुख्यजनो ! जो (जन्तवः) जीव (यस्य) जिसकी (समृतौ) अच्छे प्रकार यथार्थ बोध से युक्त बुद्धि में (रण्वाः) रमण करते और (नृषदने) मनुष्यों के स्थान में (चित्) भी (अर्हन्तः) सत्कार करते हुए (यम्) जिसको (इन्धते) अच्छे प्रकार प्रकाशित कराते और (सञ्जनयन्ति) उत्तम प्रकार उत्पन्न कराते हैं, वे (चित्) भी (कुत्रा) किसी में अनादर को नहीं प्राप्त होते हैं ॥२॥
Essence
जो जीव सब मनुष्यों के हित में वर्त्तमान हुए यथाशक्ति परोपकार करते हैं, वे योग्य हैं ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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