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Rigveda Mandal 5 / Sukta 66 / Mantra 2

87 Sukta
6 Mantra
5/66/2
Devata- मित्रावरुणौ Rishi- रातहव्य आत्रेयः Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ता हि क्ष॒त्रमवि॑ह्रुतं स॒म्यग॑सु॒र्य१॒॑माशा॑ते। अध॑ व्र॒तेव॒ मानु॑षं॒ स्व१॒॑र्ण धा॑यि दर्श॒तम् ॥२॥

ता । हि । क्ष॒त्रम् । अवि॑ऽह्रुतम् । स॒म्यक् । अ॒सु॒र्य॑म् । आशा॑ते॒ इति॑ । अध॑ । व्र॒ताऽइ॑व । मानु॑षम् । स्वः॑ । न । धा॒यि॒ । द॒र्श॒तम् ॥

Mantra without Swara
ता हि क्षत्रमविह्रुतं सम्यगसुर्य१माशाते। अध व्रतेव मानुषं स्व१र्ण धायि दर्शतम् ॥

ता। हि। क्षत्रम्। अविऽह्रुतम्। सम्यक्। असुर्यम्। आशाते इति। अध। व्रताऽइव। मानुषम्। स्वः। न। धायि। दर्शतम् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 4 Varga » 4 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! (ता) वे (हि) ही (अविह्रुतम्) नहीं कुटिल (असुर्य्यम्) विद्वानों के लिये हितकारक (सम्यक्) उत्तम प्रकार चलनेवाले (क्षत्रम्) धन वा राज्य को (आशाते) व्याप्त होते हैं (अध) इसके अनन्तर जिन्होंने हित (मानुषम्) मनुष्यसम्बन्धी (दर्शतम्) देखने योग्य (व्रतेव) कर्म्मों के सदृश और (स्वः) सुख के (न) सदृश (धायि) धारण किया ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । सब मनुष्य धर्म पथ से सुख और कर्म्म को धारण करें ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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