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Rigveda Mandal 5 / Sukta 60 / Mantra 4

87 Sukta
8 Mantra
5/60/4
Devata- मरुतो वाग्निश्च Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
व॒राइ॒वेद्रै॑व॒तासो॒ हिर॑ण्यैर॒भि स्व॒धाभि॑स्त॒न्वः॑ पिपिश्रे। श्रि॒ये श्रेयां॑सस्त॒वसो॒ रथे॑षु स॒त्रा महां॑सि चक्रिरे त॒नूषु॑ ॥४॥

व॒राःऽइ॑व । इत् । रै॒व॒तासः॑ । हिर॑ण्यैः । अ॒भि । स्व॒धाभिः॑ । त॒न्वः॑ । पि॒पि॒श्रे॒ । श्रि॒ये । श्रेयां॑सः । त॒वसः॑ । रथे॑षु । स॒त्रा । महां॑सि । च॒क्रि॒रे॒ । त॒नूषु॑ ॥

Mantra without Swara
वराइवेद्रैवतासो हिरण्यैरभि स्वधाभिस्तन्वः पिपिश्रे। श्रिये श्रेयांसस्तवसो रथेषु सत्रा महांसि चक्रिरे तनूषु ॥

वराःऽइव। इत्। रैवतासः। हिरण्यैः। अभि। स्वधाभिः। तन्वः। पिपिश्रे। श्रिये। श्रेयांसः। तवसः। रथेषु। सत्रा। महांसि। चक्रिरे। तनूषु ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 25 Mantra » 4

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Meaning
जो (श्रेयांसः) अत्यन्त कल्याण की इच्छा करते हुए (तवसः) बलवान् गतिवाले (रैवतासः) पशुओं में हुए मनुष्य (वराइव) श्रेष्ठों के तुल्य (इत्) ही (हिरण्यैः) सुवर्ण तेज आदिकों से और (स्वधाभिः) अन्न आदिकों से (तन्वः) शरीरों को (पिपिश्रे) स्थूल अवयववाले करते हैं, और (श्रिये) लक्ष्मी के लिये (रथेषु) वाहनों और (तनूषु) शरीरों में (सत्रा) सत्य (महांसि) बड़े काम (अभि, चक्रिरे) करते हैं, वे भाग्यशाली होते हैं ॥४॥
Essence
जो मनुष्य के शरीर का आश्रय करके लक्ष्मी की इच्छा करते हैं, वे दारिद्र्य का नाश करते हैं ॥४॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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