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Rigveda Mandal 5 / Sukta 56 / Mantra 2

87 Sukta
9 Mantra
5/56/2
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यथा॑ चि॒न्मन्य॑से हृ॒दा तदिन्मे॑ जग्मुरा॒शसः॑। ये ते॒ नेदि॑ष्ठं॒ हव॑नान्या॒गम॒न्तान्व॑र्ध भीमसं॑दृशः ॥२॥

यथा॑ । चि॒त् । मन्य॑से । हृ॒दा । तत् । इत् । मे॒ । ज॒ग्मुः॒ । आ॒ऽशसः॑ । ये । ते॒ । नेदि॑ष्ठम् । हव॑नानि । आ॒ऽगम॑न् । तान् । व॒र्ध॒ । भी॒मऽस॑न्दृशः ॥

Mantra without Swara
यथा चिन्मन्यसे हृदा तदिन्मे जग्मुराशसः। ये ते नेदिष्ठं हवनान्यागमन्तान्वर्ध भीमसंदृशः ॥

यथा। चित्। मन्यसे। हृदा। तत्। इत्। मे। जग्मुः। आऽशसः। ये। ते। नेदिष्ठम्। हवनानि। आऽगमन्। तान्। वर्ध। भीमऽसंदृशः ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 19 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्य ! (ये) जो (ते) आपके लिये (नेदिष्ठम्) अत्यन्त सामीप्य को (आशसः) कहनेवाले (जग्मुः) प्राप्त होते हैं (तान्) उनकी आप (वर्ध) वृद्धि करिये और (यथा, चित्) जिसी प्रकार से आप (हृदा) हृदय से (मे) मेरे लिये (तत्) उसको (मन्यसे) मानते हो, उस प्रकार (हवनानि) देने-लेने योग्य वस्तुयें (आगमन्) प्राप्त होवें और (भीमसन्दृशः) भयङ्कर दर्शन जिनका वे (इत्) ही प्राप्त होते हैं ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । मनुष्य लोग परस्पर के उपकार से सुखी हों ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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