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Rigveda Mandal 5 / Sukta 54 / Mantra 10

87 Sukta
15 Mantra
5/54/10
Devata- मरुतः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यन्म॑रुतः सभरसः स्वर्णरः॒ सूर्य॒ उदि॑ते॒ मद॑था दिवो नरः। न वोऽश्वाः॑ श्रथय॒न्ताह॒ सिस्र॑तः स॒द्यो अ॒स्याध्व॑नः पा॒रम॑श्नुथ ॥१०॥

यत् । म॒रु॒तः॒ । स॒ऽभ॒र॒सः॒ । स्वः॒ऽन॒रः॒ । सूर्ये॑ । उत्ऽइ॑ते । मद॑थ । दि॒वः॒ । न॒रः॒ । न । वः॒ । अश्वाः॑ । श्र॒थ॒य॒न्त॒ । अह॑ । सिस्र॑तः । स॒द्यः । अ॒स्य । अध्व॑नः । पा॒रम् । अ॒श्नु॒थ॒ ॥

Mantra without Swara
यन्मरुतः सभरसः स्वर्णरः सूर्य उदिते मदथा दिवो नरः। न वोऽश्वाः श्रथयन्ताह सिस्रतः सद्यो अस्याध्वनः पारमश्नुथ ॥

यत्। मरुतः। सऽभरसः। स्वःऽनरः। सूर्ये। उत्ऽइते। मदथ। दिवः। नरः। न। वः। अश्वाः। श्रथयन्त। अह। सिस्रतः। सद्यः। अस्य। अध्वनः। पारम्। अश्नुथ ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 15 Mantra » 5

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Meaning
हे (सभरसः) तुल्य पालन और पोषण करनेवाले (स्वर्णरः) सुख को प्राप्त कराते और (दिवः) कामना करते हुए (नरः) सत्य धर्म्म में पहुँचानेवाले (मरुतः) जनो ! आप लोग (उदिते) उदय को प्राप्त हुए (सूर्ये) सूर्य में (यत्) जिसको प्राप्त होकर (मदथ) आनन्दित होओ उससे (वः) आप लोगों के (सिस्रतः) चलनेवाले (अश्वाः) घोड़े (न) नहीं (श्रथयन्त, अह) हिंसा करते रुकते हैं, उनसे (अस्य) इस (अध्वनः) मार्ग के (पारम्) पार को (सद्यः) शीघ्र (अश्नुथ) प्राप्त हूजिये ॥१०॥
Essence
जो मनुष्य सूर्य्योदय से पहले उठ के जब तक सोवैं नहीं तब तक प्रयत्न करते हैं, दुःख और दारिद्र्य के अन्त को प्राप्त होकर सुखी और लक्ष्मीवान् होते हैं ॥१०॥
Subject
फिर मनुष्यों को कैसे वर्त्तना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

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