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Rigveda Mandal 5 / Sukta 51 / Mantra 7

87 Sukta
15 Mantra
5/51/7
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- स्वस्त्यात्रेयः Chhanda- निचृदुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
सु॒ता इन्द्रा॑य वा॒यवे॒ सोमा॑सो॒ दध्या॑शिरः। नि॒म्नं न य॑न्ति॒ सिन्ध॑वो॒ऽभि प्रयः॑ ॥७॥

सु॒ताः । इन्द्रा॑य । वा॒यवे॑ । सोमा॑सः । दधि॑ऽआशिरः । नि॒म्नम् । न । य॒न्ति॒ । सिन्ध॑वः । अ॒भि । प्रयः॑ ॥

Mantra without Swara
सुता इन्द्राय वायवे सोमासो दध्याशिरः। निम्नं न यन्ति सिन्धवोऽभि प्रयः ॥

सुताः। इन्द्राय। वायवे। सोमासः। दधिऽआशिरः। निम्नम्। न। यन्ति। सिन्धवः। अभि। प्रयः ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 6 Mantra » 2

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Meaning
हे मनुष्यो ! (सिन्धवः) नदियाँ (निम्नम्) अर्थात् नीचे स्थल को (न) जैसे वैसे (दध्याशिरः) धारण करने और खाने योग्य (सुताः) उत्पन्न हुए (सोमासः) ऐश्वर्य्य से युक्त पदार्थ (वायवे) वायु के सदृश बलयुक्त (इन्द्राय) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाले के लिये (प्रयः) अत्यन्त प्रिय को (अभि) सब ओर से (यन्ति) प्राप्त होते हैं ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जैसे नदियाँ समुद्र को प्राप्त होती हैं, वैसे ही बड़ी ओषधियों के सेवन करनेवाले सुख को प्राप्त होते हैं ॥७॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को कहते हैं ॥

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