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Rigveda Mandal 5 / Sukta 47 / Mantra 4

87 Sukta
7 Mantra
5/47/4
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- प्रतिरथ आत्रेयः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
च॒त्वार॑ ईं बिभ्रति क्षेम॒यन्तो॒ दश॒ गर्भं॑ च॒रसे॑ धापयन्ते। त्रि॒धात॑वः पर॒मा अ॑स्य॒ गावो॑ दि॒वश्च॑रन्ति॒ परि॑ स॒द्यो अन्ता॑न् ॥४॥

च॒त्वारः॑ । ई॒म् । बि॒भ्र॒ति॒ । क्षे॒म॒ऽयन्तः॑ । दश॑ । गर्भ॑म् । च॒रसे॑ । धा॒प॒य॒न्ते॒ । त्रि॒ऽधात॑वः । प॒र॒माः । अ॒स्य॒ । गावः॑ । दि॒वः । च॒र॒न्ति॒ । परि॑ । स॒द्यः । अन्ता॑न् ॥

Mantra without Swara
चत्वार ईं बिभ्रति क्षेमयन्तो दश गर्भं चरसे धापयन्ते। त्रिधातवः परमा अस्य गावो दिवश्चरन्ति परि सद्यो अन्तान् ॥

चत्वारः। ईम्। बिभ्रति। क्षेमऽयन्तः। दश। गर्भम्। चरसे। धापयन्ते। त्रिऽधातवः। परमाः। अस्य। गावः। दिवः। चरन्ति। परि। सद्यः। अन्तान् ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 3 Varga » 1 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! (अस्य) इस संसार के मध्य में (चरसे) चलने को (क्षेमयन्तः) रक्षा करते हुए (परमाः) प्रकृष्ट (त्रिधातवः) तीन सत्त्व, रज और तमोगुण धारण करनेवाले जिनके वे और (चत्वारः) चार पृथिवी आदि (ईम्) सब ओर से (गर्भम्) समस्त जगत् उत्पत्ति के स्थान को (बिभ्रति) धारण करते हैं तथा (दश) दश दिशाओं को (धापयन्ते) धारण कराते हैं और (सद्यः) शीघ्र (दिवः) प्रकाश के मध्य में (अन्तान्) समीपवर्ती देशों के (गावः) किरणें (परि, चरन्ति) चारों और चलते हैं, ऐसा जानिये ॥४॥
Essence
हे मनुष्यो ! इस संसार के धारण करनेवाले पृथिवी, जल, तेज और पवन हैं और वे कारण से उत्पन्न हो के उपयुक्त होते हैं ॥४॥
Subject
मनुष्यों को चाहिये कि पृथिवी आदि तत्त्व जगत् के पालक हैं, ऐसा जानें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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