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Rigveda Mandal 5 / Sukta 45 / Mantra 1

87 Sukta
11 Mantra
5/45/1
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अवत्सारः काश्यप अन्ये च दृष्टलिङ्गाः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वि॒दा दि॒वो वि॒ष्यन्नद्रि॑मु॒क्थैरा॑य॒त्या उ॒षसो॑ अ॒र्चिनो॑ गुः। अपा॑वृत व्र॒जिनी॒रुत्स्व॑र्गा॒द्वि दुरो॒ मानु॑षीर्दे॒व आ॑वः ॥१॥

वि॒दाः । दि॒वः । वि॒ऽस्यन् । अद्रि॑म् । उ॒क्थैः । आ॒ऽय॒त्याः । उ॒षसः॑ । अ॒र्चिनः॑ । गुः॒ । अप॑ । अ॒वृ॒त॒ । व्र॒जिनीः॑ । उत् । स्वः॑ । गा॒त् । वि । दुरः॑ । मानु॑षीः । दे॒वः । आ॒व॒रित्या॑वः ॥

Mantra without Swara
विदा दिवो विष्यन्नद्रिमुक्थैरायत्या उषसो अर्चिनो गुः। अपावृत व्रजिनीरुत्स्वर्गाद्वि दुरो मानुषीर्देव आवः ॥

विदाः। दिवः। विऽस्यन्। अद्रिम्। उक्थैः। आऽयत्याः। उषसः। अर्चिनः। गुः। अप। अवृत। व्रजिनीः। उत्। स्वः। गात्। वि। दुरः। मानुषीः। देवः। आवरित्यावः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 26 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (स्वः, देवः) श्रेष्ठ गुणों से विशिष्ट सूर्य्य वा मेघ (मानुषीः) मनुष्य सम्बन्धी (दुरः) द्वारों को (वि, गात्) विशेषतया प्राप्त होता और (आवः) ढाँपता है और (अद्रिम्) मेघ को और (व्रजिनीः) वर्जन क्रियाओं को (उद्, अप, अवृत) अत्यन्त दूर करते हैं, वैसे ही (दिवः) कामना करते हुए (विदाः) विद्वान् जन (अर्चिनः) सत्कार करनेवाले (उक्थैः) वेदविद्या से उत्पन्न हुए उपदेशों से (आयत्याः) पीछे से हुए (उषसः) प्रभात कालों के सदृश (विष्यन्) व्याप्त होते और (गुः) चलते हैं, उनकी निरन्तर सेवा करो ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो प्रभातकाल और सूर्य्य के सदृश मनुष्यरूप प्रजाओं में विद्या और धर्म्म के प्रकाश करनेवाले होवें, वे ही अध्यापक और उपदेशक होवें ॥१॥
Subject
अब ग्यारह ऋचावाले पैंतालीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में आदित्य विषय को कहते हैं ॥

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