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Rigveda Mandal 5 / Sukta 43 / Mantra 15

87 Sukta
17 Mantra
5/43/15
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- अत्रिः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
बृ॒हद्वयो॑ बृह॒ते तुभ्य॑मग्ने धिया॒जुरो॑ मिथु॒नासः॑ सचन्त। दे॒वोदे॑वः सु॒हवो॑ भूतु॒ मह्यं॒ मा नो॑ मा॒ता पृ॑थि॒वी दु॑र्म॒तौ धा॑त् ॥१५॥

बृ॒हत् । वयः॑ । बृ॒ह॒ते । तुभ्य॑म् । अ॒ग्ने॒ । धि॒या॒ऽजुरः॑ । मि॒थु॒नासः॑ । स॒च॒न्त॒ । दे॒वःऽदे॑वः । सु॒ऽहवः॑ । भू॒तु॒ । मह्य॑म् । मा । नः॒ । मा॒ता । पृ॒थि॒वी । दुः॒ऽम॒तौ । धा॒त् ॥

Mantra without Swara
बृहद्वयो बृहते तुभ्यमग्ने धियाजुरो मिथुनासः सचन्त। देवोदेवः सुहवो भूतु मह्यं मा नो माता पृथिवी दुर्मतौ धात् ॥

बृहत्। वयः। बृहते। तुभ्यम्। अग्ने। धियाऽजुरः। मिथुनासः। सचन्त। देवःऽदेवः। सुऽहवः। भूतु। मह्यम्। मा। नः। माता। पृथिवी। दुःऽमतौ। धात् ॥१५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 22 Mantra » 5

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Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! जो (धियाजुरः) बुद्धि वा कर्म्म से प्राप्त हुई वृद्धावस्था जिनको ऐसे (मिथुनासः) स्त्रियों के सहित वर्त्तमान जन (बृहते) वृद्ध (तुभ्यम्) आपके लिये (बृहत्) बड़े (वयः) जीवन को (सचन्त) उत्तम प्रकार प्राप्त होते हैं और (सुहवः) उत्तम प्रकार प्रशंसा करने योग्य (देवोदेवः) विद्वान् विद्वान् (मह्यम्) मेरे लिये सुखकारी (भूतु) हो और (पृथिवी) भूमि के सदृश (माता) माता (नः) हम लोगों को (दुर्म्मतौ) दुष्ट बुद्धि में (मा) नहीं (धात्) धारण करे ॥१५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो अवस्था और विद्या में वृद्ध आप लोगों को विद्याओं से सम्बन्धित करते हैं और माता के सदृश कृपा से रक्षा करते हैं, वे आप लोगों के पूज्य हों ॥१५॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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