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Rigveda Mandal 5 / Sukta 4 / Mantra 1

87 Sukta
11 Mantra
5/4/1
Devata- अग्निः Rishi- वसुश्रुत आत्रेयः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वाम॑ग्ने॒ वसु॑पतिं॒ वसू॑नाम॒भि प्र म॑न्दे अध्व॒रेषु॑ राजन्। त्वया॒ वाजं॑ वाज॒यन्तो॑ जयेमा॒भि ष्या॑म पृत्सु॒तीर्मर्त्या॑नाम् ॥१॥

त्वाम् । अ॒ग्ने॒ । वसु॑ऽपतिम् । वसू॑नाम् । अ॒भि । प्र । म॒न्दे॒ । अ॒ध्व॒रेषु॑ । रा॒ज॒न् । त्वया॑ । वाज॑म् । वा॒ज॒ऽयन्तः॑ । ज॒ये॒म॒ । अ॒भि । स्या॒म॒ । पृ॒त्सु॒तीः । मर्त्या॑नाम् ॥

Mantra without Swara
त्वामग्ने वसुपतिं वसूनामभि प्र मन्दे अध्वरेषु राजन्। त्वया वाजं वाजयन्तो जयेमाभि ष्याम पृत्सुतीर्मर्त्यानाम् ॥

त्वाम्। अग्ने। वसुऽपतिम्। वसूनाम्। अभि। प्र। मन्दे। अध्वरेषु। राजन्। त्वया। वाजम्। वाजऽयन्तः। जयेम। अभि। स्याम। पृत्सुतीः। मर्त्यानाम् ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 18 Mantra » 1

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Meaning
हे (अग्ने) बिजुली के सदृश विद्या से व्याप्त (राजन्) उत्तम गुणों से प्रकाशमान राजन् ! (अध्वरेषु) नहीं हिंसा करने योग्य प्रजापालन और न्यायव्यवहारों में (वसूनाम्) धनों के (वसुपतिम्) धनस्वामी (त्वाम्) आप को मैं (अभि, प्र, मन्दे) सब ओर से आनन्द देऊँ वा आनन्द देता हूँ और (त्वया) अधिष्ठातारूप आपके साथ (वाजम्) संग्राम को (वाजयन्त) करते वा कराते हुए हम लोग (मर्त्यानाम्) मरण धर्मवाले शत्रुओं की (पृत्सुतीः) सेनाओं को (अभि, जयेम) सब ओर से जीतें, इससे धन और यश से युक्त (स्याम) होवें ॥१॥
Essence
जिनके अधिष्ठाता मुखिया धार्मिक और विद्वान् जन होवें, उनका सदा ही विजय, राज्य की वृद्धि और अतुल लक्ष्मी होती है ॥१॥
Subject
अब ग्यारह ऋचावाले चतुर्थ सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजविषय को कहते हैं ॥

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