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Rigveda Mandal 5 / Sukta 33 / Mantra 7

87 Sukta
10 Mantra
5/33/7
Devata- इन्द्र: Rishi- संवरणः प्राजापत्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒वा न॑ इन्द्रो॒तिभि॑रव पा॒हि गृ॑ण॒तः शू॑र का॒रून्। उ॒त त्वचं॒ दद॑तो॒ वाज॑सातौ पिप्री॒हि मध्वः॒ सुषु॑तस्य॒ चारोः॑ ॥७॥

ए॒व । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । ऊ॒तिऽभिः॑ । अ॒व॒ । पा॒हि । गृ॒ण॒तः । शू॒र॒ । क॒रून् । उ॒त । त्वच॑म् । दद॑तः । वाज॑ऽसातौ । पि॒प्री॒हि । मध्वः॑ । सुऽसु॑तस्य । चारोः॑ ॥

Mantra without Swara
एवा न इन्द्रोतिभिरव पाहि गृणतः शूर कारून्। उत त्वचं ददतो वाजसातौ पिप्रीहि मध्वः सुषुतस्य चारोः ॥

एव। नः। इन्द्र। ऊतिऽभिः। अव। पाहि। गृणतः। शूर। कारून्। उत। त्वचम्। ददतः। वाजऽसातौ। पिप्रीहि। मध्वः। सुऽसुतस्य। चारोः ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 2 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्द्र) राजन् ! आप (ऊतिभिः) अन्वेक्षण आदि रक्षा आदिकों से (एवा) ही (गृणतः) उपदेशक (कारून्) शिल्पी (नः) हम लोगों की (अव) रक्षा कीजिये और हे (शूर) भय से रहित ! (वाजसातौ) सङ्ग्राम में (त्वचम्) त्वचा को आच्छादन करने और रक्षा करनेवाले कवच को (ददतः) देते हुए (सुषुतस्य) उत्तम प्रकार संस्कार किये गये (मध्वः) मधुर और (चारोः) उत्तम जन के ऐश्वर्य्य का (पाहि) पालन कीजिये और (उत) भी (पिप्रीहि) प्राप्त हूजिये ॥७॥
Essence
हे राजन् ! आप शूरवीर विद्वान् शिल्पीजनों की रक्षा कर प्रजाओं का निरन्तर पालन करके सङ्ग्राम में शत्रुओं को जीत कर प्राप्त हूजिये ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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