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Rigveda Mandal 5 / Sukta 3 / Mantra 7

87 Sukta
12 Mantra
5/3/7
Devata- अग्निः Rishi- वसुश्रुत आत्रेयः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यो न॒ आगो॑ अ॒भ्येनो॒ भरा॒त्यधीद॒घम॒घशं॑से दधात। ज॒ही चि॑कित्वो अ॒भिश॑स्तिमे॒तामग्ने॒ यो नो॑ म॒र्चय॑ति द्व॒येन॑ ॥७॥

यः । नः॒ । आगः॑ । अ॒भि । एनः॑ । भरा॑ति । अधि॑ । इत् । अ॒घम् । अ॒घऽशं॑से । द॒धा॒त॒ । ज॒हि । चि॒कि॒त्वः॒ । अ॒भिऽश॑स्तिम् । ए॒ताम् । अ॒ग्ने॒ । यः । नः॒ । म॒र्चय॑ति । द्व॒येन॑ ॥

Mantra without Swara
यो न आगो अभ्येनो भरात्यधीदघमघशंसे दधात। जही चिकित्वो अभिशस्तिमेतामग्ने यो नो मर्चयति द्वयेन ॥

यः। नः। आगः। अभि। एनः। भराति। अधि। इत्। अघम्। अघऽशंसे। दधात। जहि। चिकित्वः। अभिऽशस्तिम्। एताम्। अग्ने। यः। नः। मर्चयति। द्वयेन ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 17 Mantra » 1

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Meaning
हे (चिकित्वः) विज्ञानवान् (अग्ने) अग्नि के सदृश प्रतापी पृथिवी के पालनेवाले ! (यः) जो (नः) हम लोगों के (आगः) अपराध और (एनः) पाप को (अभि, भराति) सन्मुख धारण करता है उस (अघशंसे) चोरीरूप कर्म में जो (अघम्) पाप (इत) ही को (अधि, दधात) अधिस्थापन करे और (यः) जो (द्वयेन) पाप और अपराध से (नः) हम लोगों को (मर्चयति) बाधता है और (एताम्) इस (अभिशस्तिम्) सब ओर से हिंसा को करता है, उसका आप (जही) त्याग कीजिए ॥७॥
Essence
हे राजन् ! जो प्रजा को दोष देनेवाले होवें, उनको सदा ही दण्ड दीजिये और जो श्रेष्ठ आचरण करनेवाले होवें, उनको मानो अर्थात् सत्कार करो ॥७॥
Subject
फिर चोरी आदि अपराधनिवारण प्रजापालन राजधर्म को कहते हैं ॥

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