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Rigveda Mandal 5 / Sukta 3 / Mantra 3

87 Sukta
12 Mantra
5/3/3
Devata- अग्निः Rishi- वसुश्रुत आत्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तव॑ श्रि॒ये म॒रुतो॑ मर्जयन्त॒ रुद्र॒ यत्ते॒ जनि॑म॒ चारु॑ चि॒त्रम्। प॒दं यद्विष्णो॑रुप॒मं नि॒धायि॒ तेन॑ पासि॒ गुह्यं॒ नाम॒ गोना॑म् ॥३॥

तव॑ । श्रि॒ये । म॒रुतः॑ । म॒र्ज॒य॒न्त॒ । रुद्र॑ । यत् । ते॒ । जनि॑म । चारु॑ । चि॒त्रम् । प॒दम् । यत् । विष्णोः॑ । उ॒प॒ऽमम् । नि॒ऽधायि॑ । तेन॑ । पा॒सि॒ । गुह्यम् । नाम॑ । गोना॑म् ॥

Mantra without Swara
तव श्रिये मरुतो मर्जयन्त रुद्र यत्ते जनिम चारु चित्रम्। पदं यद्विष्णोरुपमं निधायि तेन पासि गुह्यं नाम गोनाम् ॥

तव। श्रिये। मरुतः। मर्जयन्त। रुद्र। यत्। ते। जनिम। चारु। चित्रम्। पदम्। यत्। विष्णोः। उपऽमम्। निऽधायि। तेन। पासि। गुह्यम्। नाम। गोनाम् ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 16 Mantra » 3

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Meaning
हे (रुद्र) दुष्टों के रुलानेवाले ! जो (मरुतः) मनुष्य (तव) आपकी (श्रिये) लक्ष्मी के लिये (मर्जयन्त) शुद्ध करें (ते) आपका (यत्) जो (चारु) सुन्दर (चित्रम्) अद्भुत (पदम्) प्राप्त होने योग्य (जनिम) जन्म उसको शुद्ध करें और (यत्) जो आप (विष्णोः) व्यापक ईश्वर का (उपमम्) उपमायुक्त और (गोनाम्) इन्द्रियों वा किरणों का (गुह्यम्) गुप्त (नाम) नाम (निधायि) धारण करें (तेन) इसी हेतु से उनका आप (पासि) पालन करते हो, इससे सत्कार करने योग्य हो ॥३॥
Essence
हे राजन् ! इसी से आपके जन्म का साफल्य होवे, जिससे आप ईश्वर के सदृश पक्षपात का त्याग करके प्रजाओं का पालन करो ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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