Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 5 / Sukta 29 / Mantra 10

87 Sukta
15 Mantra
5/29/10
Devata- इन्द्र: Rishi- गौरिवीतिः शाक्त्यः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्रान्यच्च॒क्रम॑वृहः॒ सूर्य॑स्य॒ कुत्सा॑या॒न्यद्वरि॑वो॒ यात॑वेऽकः। अ॒नासो॒ दस्यूँ॑रमृणो व॒धेन॒ नि दु॑र्यो॒ण आ॑वृणङ्मृ॒ध्रवा॑चः ॥१०॥

प्र । अ॒न्यत् । च॒क्रम् । अ॒वृ॒हः॒ । सूर्य॑स्य । कुत्सा॑य । अ॒न्यत् । वरि॑वः । यात॑वे । अ॒क॒रित्य॑कः । अ॒नासः॑ । दस्यू॑न् । अ॒मृ॒णः॒ । व॒धेन॑ । नि । दु॒र्यो॒णे । अ॒वृ॒ण॒क् । मृ॒ध्रऽवा॑चः ॥

Mantra without Swara
प्रान्यच्चक्रमवृहः सूर्यस्य कुत्सायान्यद्वरिवो यातवेऽकः। अनासो दस्यूँरमृणो वधेन नि दुर्योण आवृणङ्मृध्रवाचः ॥

प्र। अन्यत्। चक्रम्। अवृहः। सूर्यस्य। कुत्साय। अन्यत्। वरिवः। यातवे। अकरित्यकः। अनासः। दस्यून्। अमृणः। वधेन। नि। दुर्योणे। अवृणक्। मृध्रऽवाचः ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 24 Mantra » 5

Bhashya

More bhashyas
Meaning
हे राजन् ! आप (सूर्यस्य) सूर्य के सदृश (अन्यत्) अन्य (चक्रम्) चक्र की (प्र, अवृहः) उत्तम वृद्धि करिये और (कुत्साय) वज्र के लिये (अन्यत्) अन्य (वरिवः) सेवन को (यातवे) प्राप्त होने को (अकः) करिये तथा (अनासः) मुखरहित (दस्यून्) दुष्ट चोरों का (वधेन) वध से (अमृणः) नाश करिये और (दुर्य्योणे) गृह के प्राप्त होने में (मृध्रवाचः) कुत्सित वाणियोंवाले जनों को (नि, आवृणक्) निरन्तर वर्जिये ॥१०॥
Essence
हे राजन् ! जैसे सूर्य्य अपने चक्र का आकर्षण से वर्त्ताव करता है, वैसे ही विमान आदि वाहनों से राज्य का अनुवर्त्तन करो और चोर तथा दुष्ट वाणीवालों का नाश करके राज्य में नहीं चोरी करनेवाले और श्रेष्ठ वचनोंवाले जनों का सम्पादन कीजिये ॥१०॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

We are thankful to https://vedicscriptures.in for providing us a substantial amount of data for this section of the Vedas.