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Rigveda Mandal 5 / Sukta 28 / Mantra 3

87 Sukta
6 Mantra
5/28/3
Devata- अग्निः Rishi- विश्वावारात्रेयी Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अग्ने॒ शर्ध॑ मह॒ते सौभ॑गाय॒ तव॑ द्यु॒म्नान्यु॑त्त॒मानि॑ सन्तु। सं जा॑स्प॒त्यं सु॒यम॒मा कृ॑णुष्व शत्रूय॒ताम॒भि ति॑ष्ठा॒ महां॑सि ॥३॥

अग्ने॑ । शर्ध॑ । म॒ह॒ते । सौभ॑गाय । तव॑ । द्यु॒म्नानि॑ । उ॒त्ऽत॒मानि॑ । स॒न्तु॒ । सम् । जः॒ऽप॒त्यम् । सु॒ऽयम॑म् । आ । कृ॒णु॒ष्व॒ । श॒त्रु॒ऽय॒ताम् । अ॒भि । ति॒ष्ठ॒ । महां॑सि ॥

Mantra without Swara
अग्ने शर्ध महते सौभगाय तव द्युम्नान्युत्तमानि सन्तु। सं जास्पत्यं सुयममा कृणुष्व शत्रूयतामभि तिष्ठा महांसि ॥

अग्ने। शर्ध। महते। सौभगाय। तव। द्युम्नानि। उत्ऽतमानि। सन्तु। सम्। जाःऽपत्यम्। सुऽयमम्। आ। कृणुष्व। शत्रुऽयताम्। अभि। तिष्ठ। महांसि ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 22 Mantra » 3

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Meaning
हे (शर्ध) प्रशंसित बल से युक्त (अग्ने) विद्वन् ! (तव) आपके (महते) बड़े (सौभगाय) सुन्दर ऐश्वर्य्य के लिये (उत्तमानि) श्रेष्ठ (द्युम्नानि) यश वा धन (सन्तु) हों और तुम (सुयमम्) सुन्दर सत्य आचरणों का ग्रहण जिसमें ऐसे (जास्पत्यम्) स्त्री के पतिपने को (आ, कृणुष्व) अच्छे प्रकार करिये और (शत्रूयताम्) शत्रु के सदृश आचरण करते हुओं की (महांसि) बड़ी सेनाओं के (सम्, अभि, तिष्ठा) सन्मुख स्थित हूजिये ॥३॥
Essence
हे धर्मिष्ठो ! हम लोग आपके लिये बड़े ऐश्वर्य्य की इच्छा करें और आप दोनों स्त्री और पुरुष जितेन्द्रिय, धर्म्मात्मा, बलवान् और पुरुषार्थी होकर सम्पूर्ण दुष्टों की सेना को जीतिये ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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