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Rigveda Mandal 5 / Sukta 21 / Mantra 1

87 Sukta
4 Mantra
5/21/1
Devata- अग्निः Rishi- सस आत्रेयः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
म॒नु॒ष्वत्त्वा॒ नि धी॑महि मनु॒ष्वत्समि॑धीमहि। अग्ने॑ मनु॒ष्वद॑ङ्गिरो दे॒वान्दे॑वय॒ते य॑ज ॥१॥

म॒नु॒ष्वत् । त्वा॒ । नि । धी॒म॒हि॒ । म॒नु॒ष्वत् । सम् । इ॒धी॒म॒हि॒ । अग्ने॑ । म॒नु॒ष्वत् । अ॒ङ्गि॒रः॒ । दे॒वान् । दे॒व॒ऽय॒ते । य॒ज॒ ॥

Mantra without Swara
मनुष्वत्त्वा नि धीमहि मनुष्वत्समिधीमहि। अग्ने मनुष्वदङ्गिरो देवान्देवयते यज ॥

मनुष्वत्। त्वा। नि। धीमहि। मनुष्वत्। सम्। इधीमहि। अग्ने। मनुष्वत्। अङ्गिरः। देवान्। देवऽयते। यज ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 13 Mantra » 1

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Meaning
हे (अङ्गिरः) प्राणों के सदृश प्रिय (अग्ने) विद्वन् ! जैसे हम लोग कार्य्य की सिद्धि के लिये अग्नि को (मनुष्वत्) मनुष्य को जैसे वैसे (नि, धीमहि) निरन्तर धारण होवें और (देवयते) श्रेष्ठ गुणों की कामना करते हुए के लिये (देवान्) श्रेष्ठ विद्यायुक्त विद्वानों को (मनुष्वत्) मनुष्यों के समान (सम्, इधीमहि) प्रकाशित करें वैसे (त्वा) आपको उत्तम कर्म्म में स्थित करें और आप (मनुष्वत्) मनुष्य के तुल्य (यज) मिलिये अर्थात् कार्य्यों को प्राप्त हूजिये ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो मनुष्य विचारशील होकर श्रेष्ठ गुणों की कामना करते हैं, वे अग्नि आदि पदार्थों की विद्या को जानें ॥१॥
Subject
अब चार ऋचावाले इक्कीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्निविषय को कहते हैं ॥

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