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Rigveda Mandal 5 / Sukta 2 / Mantra 7

87 Sukta
12 Mantra
5/2/7
Devata- अग्निः Rishi- कुमार आत्रेयो वृषो वा जार उभौ वा Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
शुन॑श्चि॒च्छेपं॒ निदि॑तं स॒हस्रा॒द्यूपा॑दमुञ्चो॒ अश॑मिष्ट॒ हि षः। ए॒वास्मद॑ग्ने॒ वि मु॑मुग्धि॒ पाशा॒न्होत॑श्चिकित्व इ॒ह तू नि॒षद्य॑ ॥७॥

शुनः॒ऽशेप॑म् । चि॒त् । निऽदि॑तम् । स॒हस्रा॑त् । यूपा॑त् । अ॒मु॒ञ्चः॒ । अश॑मिष्ट । हि । सः । ए॒व । अ॒स्मत् । अ॒ग्ने॒ । वि । मु॒मु॒ग्धि॒ । पासा॑न् । होत॒रिति॑ । चि॒कि॒त्वः॒ । इ॒ह । तु । नि॒ऽसद्य॑ ॥

Mantra without Swara
शुनश्चिच्छेपं निदितं सहस्राद्यूपादमुञ्चो अशमिष्ट हि षः। एवास्मदग्ने वि मुमुग्धि पाशान्होतश्चिकित्व इह तू निषद्य ॥

शुनः। चित्। शेपम्। निऽदितम्। सहस्रात्। यूपात्। अमुञ्चः। अशमिष्ट। हि। सः। एव। अस्मत्। अग्ने। वि। मुमुग्धि। पाशान्। होतरिति। चिकित्वः। इह। तु। निऽसद्य ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 15 Mantra » 1

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Meaning
हे (अग्ने) विद्वन् ! आप (सहस्रात्) असंख्य (यूपात्) मिले वा न मिले हुए बन्धन से (निदितम्) निन्दित (शुनःशेपम्) सुख के प्राप्त कराने और इन्द्रियाराम अर्थात् इन्द्रियों में रमण रखनेवाले को (चित्) भी (अमुञ्चः) त्याग करो (हि) जिससे (सः) वह (अशमिष्ट) शान्त होता (एव) ही है। हे (होतः) हवन करनेवाले (चिकित्व) बुद्धिमान् ! (इह) यहाँ युक्तधर्म्म सम्बन्धी व्यवहार में (निषद्य) प्रवृत्त होकर (अस्मत्) हम लोगों से (पाशान्) संसाररूप बन्धनों को (तू) फिर (वि, मुमुग्धि) काटिये ॥७॥
Essence
विद्वानों का यही आवश्यक कर्म्म है, जो सब मनुष्यों को अविद्या और अधर्म्माचरण से अलग कर विद्वान् धार्मिक बना उनका दुःखबन्धन छुड़ाना निरन्तर करना चाहिये ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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