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Rigveda Mandal 5 / Sukta 16 / Mantra 4

87 Sukta
5 Mantra
5/16/4
Devata- अग्निः Rishi- पुरुरात्रेयः Chhanda- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अधा॒ ह्य॑ग्न एषां सु॒वीर्य॑स्य मं॒हना॑। तमिद्य॒ह्वं न रोद॑सी॒ परि॒ श्रवो॑ बभूवतुः ॥४॥

अध॑ । हि । अ॒ग्ने॒ । ए॒षा॒म् । सु॒ऽवीर्य॑स्य । मं॒हना॑ । तम् । इत् । य॒ह्वम् । न । रोद॑सी॒ इति॑ । परि॑ । श्रवः॑ । ब॒भू॒व॒तुः॒ ॥

Mantra without Swara
अधा ह्यग्न एषां सुवीर्यस्य मंहना। तमिद्यह्वं न रोदसी परि श्रवो बभूवतुः ॥

अध। हि। अग्ने। एषाम्। सुऽवीर्यस्य। मंहना। तम्। इत्। यह्वम्। न। रोदसी इति। परि। श्रवः। बभूवतुः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 8 Mantra » 4

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Meaning
हे (अग्ने) राजन् ! (एषाम्) इन वीरों और (सुवीर्यस्य) उत्तम पराक्रमवाले के (मंहना) बड़प्पन से जो (तम्) उसको (इत्) ही (यह्वम्) बड़े सूर्य्य (अधा) इसके अन्तर (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी के (न) सदृश (श्रवः) अन्न जैसे हो, वैसे (परि) सब ओर से (बभूवतुः) होते हैं, वे (हि) ही विजय को प्राप्त होते हैं ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो बड़ी, उत्तम प्रकार शिक्षित सेना को प्राप्त होते हैं, उनके ही राज्य का ऐश्वर्य बढ़ता है ॥४॥
Subject
अब राज्य और ऐश्वर्य्यवृद्धि को कहते हैं ॥

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