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Rigveda Mandal 5 / Sukta 16 / Mantra 3

87 Sukta
5 Mantra
5/16/3
Devata- अग्निः Rishi- पुरुरात्रेयः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒स्य स्तोमे॑ म॒घोनः॑ स॒ख्ये वृ॒द्धशो॑चिषः। विश्वा॒ यस्मि॑न्तुवि॒ष्वणि॒ सम॒र्ये शुष्म॑माद॒धुः ॥३॥

अ॒स्य । स्तोमे॑ । म॒घोनः॑ । स॒ख्ये । वृ॒द्धऽशो॑चिषः । विश्वा॑ । यस्मि॑न् । तु॒वि॒ऽस्वणि॑ । सम् । अ॒र्ये । शुष्म॑म् । आ॒ऽद॒धुः ॥

Mantra without Swara
अस्य स्तोमे मघोनः सख्ये वृद्धशोचिषः। विश्वा यस्मिन्तुविष्वणि समर्ये शुष्ममादधुः ॥

अस्य। स्तोमे। मघोनः। सख्ये। वृद्धऽशोचिषः। विश्वा। यस्मिन्। तुविऽस्वनि। सम्। अर्ये। शुष्मम्। आऽदधुः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 8 Mantra » 3

Bhashya

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Meaning
जो मनुष्य (अस्य) इस (वृद्धशोचिषः) वृद्ध अर्थात् बढ़ी हुई कान्ति जिसकी ऐसे (मघोनः) बहुत धन से युक्त पुरुष की (स्तोमे) प्रशंसा में और (सख्ये) मित्रपन वा मित्र के कार्य्य के लिये (यस्मिन्) जिस (तुविष्वणि) बलसेवन तथा (सम्, अर्य्ये) अच्छे प्रकार स्वामी वा वैश्य में (शुष्मम्) बल को (आदधुः) सब प्रकार धारण करें, वे (विश्वा) सम्पूर्ण सुखों को प्राप्त होवें ॥३॥
Essence
जो मित्र होकर शरीर और आत्मा के बल को धारण करके प्रयत्न करते हैं, वे सङ्ग्रामादिकों में विजय को प्राप्त होकर प्रशंसित लक्ष्मीवान् होते हैं ॥३॥
Subject
अब संग्रामविजयविषय को कहते हैं ॥

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