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Rigveda Mandal 5 / Sukta 14 / Mantra 4

87 Sukta
6 Mantra
5/14/4
Devata- अग्निः Rishi- सुतम्भर आत्रेयः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्जा॒तो अ॑रोचत॒ घ्नन्दस्यू॒ञ्ज्योति॑षा॒ तमः॑। अवि॑न्द॒द्गा अ॒पः स्वः॑ ॥४॥

अ॒ग्निः । जा॒तः । अ॒रो॒च॒त॒ । घ्नन् । दस्यू॑न् । ज्योति॑षा । तमः॑ । अवि॑न्दत् । गाः । अ॒पः । स्वः॑ ॥

Mantra without Swara
अग्निर्जातो अरोचत घ्नन्दस्यूञ्ज्योतिषा तमः। अविन्दद्गा अपः स्वः ॥

अग्निः। जातः। अरोचत। घ्नन्। दस्यून्। ज्योतिषा। तमः। अविन्दत्। गाः। अपः। स्व१रिति स्वः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 6 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! राजा जैसे (जातः) प्रकट हुआ (अग्निः) अग्नि (ज्योतिषा) प्रकाश से (तमः) अन्धकाररूप रात्रि का (घ्नन्) नाश करता हुआ (अरोचत) प्रकाशित होता और (गाः) किरणों (अपः) अन्तरिक्ष और (स्वः) सूर्य्य को (अविन्दत्) प्राप्त होता, वैसे प्राप्त हुए विद्या विनय जिसको वह (दस्यून्) दुष्ट चोरों का नाश करते हुए और न्याय से अन्याय का निवारण करके विजय और यश को प्राप्त हो ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे अग्नि अन्धकार का निवारण करके प्रकाशित होता है, वैसे राजा दुष्ट चोरों का निवारण करके विशेष शोभित होवें ॥४॥
Subject
फिर अग्निविषय को कहते हैं ॥

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