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Rigveda Mandal 5 / Sukta 10 / Mantra 7

87 Sukta
7 Mantra
5/10/7
Devata- अग्निः Rishi- गय आत्रेयः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वं नो॑ अग्ने अङ्गिरः स्तु॒तः स्तवा॑न॒ आ भ॑र। होत॑र्विभ्वा॒सहं॑ र॒यिं स्तो॒तृभ्यः॒ स्तव॑से च न उ॒तैधि॑ पृ॒त्सु नो॑ वृ॒धे ॥७॥

त्वम् । नः॒ । अ॒ग्ने॒ । अ॒ङ्गि॒रः॒ । स्तु॒तः । स्तवा॑नः । आ । भ॒र॒ । होतः॑ । वि॒भ्व॒ऽसह॑म् । र॒यिम् । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । स्तव॑से । च॒ । नः॒ । उ॒त । ए॒धि॒ । पृ॒त्ऽसु । नः॒ । वृ॒धे ॥

Mantra without Swara
त्वं नो अग्ने अङ्गिरः स्तुतः स्तवान आ भर। होतर्विभ्वासहं रयिं स्तोतृभ्यः स्तवसे च न उतैधि पृत्सु नो वृधे ॥

त्वम्। नः। अग्ने। अङ्गिरः। स्तुतः। स्तवानः। आ। भर। होतः। विभ्वऽसहम्। रयिम्। स्तोतृभ्यः। स्तवसे। च। नः। उत। एधि। पृत्ऽसु। नः। वृधे ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 2 Mantra » 7

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Meaning
हे (होतः) दाता और (अङ्गिरः) प्राण के सदृश प्रिय (अग्ने) विद्वन् ! (स्तुतः) प्रशंसित (स्तवानः) प्रशंसा करते हुए (त्वम्) आप (नः) हम लोगों के लिये (विभ्वासहम्) व्यापकों के अच्छे प्रकार सहनेवाले (रयिम्) धन को (आ, भर) धारण कीजिये तथा (स्तोतृभ्यः) स्तुति करनेवालों और (स्तवसे) स्तुति करनेवाले के लिये (च) भी (नः) हम लोगों को धारण कीजिये (उत) और (पृत्सु) संग्रामों में (वृधे) वृद्धि के लिये (एधि) प्राप्त हूजिये ॥७॥
Essence
विद्यार्थियों को चाहिये कि विद्वानों की इस प्रकार प्रार्थना करें कि हे भगवानो ! अर्थात् विद्यारूप ऐश्वर्य्ययुक्त महाशयो ! आप लोग हम लोगों को ब्रह्मचर्य्य करा और उत्तम शिक्षा तथा विद्या देके और संग्रामों को जीतकर हम लोगों की निरन्तर वृद्धि करिये ॥७॥ इस सूक्त में अग्निशब्दार्थ विद्वान् और विद्यार्थी के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह दशवाँ सूक्त और दूसरा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब विद्यार्थिविषय को कहते हैं ॥

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