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Rigveda Mandal 5 / Sukta 10 / Mantra 4

87 Sukta
7 Mantra
5/10/4
Devata- अग्निः Rishi- गय आत्रेयः Chhanda- स्वराड्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ये अ॑ग्ने चन्द्र ते॒ गिरः॑ शु॒म्भन्त्यश्व॑राधसः। शुष्मे॑भिः शु॒ष्मिणो॒ नरो॑ दि॒वश्चि॒द्येषां॑ बृ॒हत्सु॑की॒र्तिर्बोध॑ति॒ त्मना॑ ॥४॥

ये । अ॒ग्ने॒ । च॒न्द्र॒ । ते॒ । गिरः॑ । शु॒म्भन्ति॑ । अश्व॑ऽराधसः । शुष्मे॑भिः । शु॒ष्मिणः॑ । नरः॑ । दि॒वः । चि॒त् । येषा॑म् । बृ॒हत् । सु॒ऽकी॒र्तिः । बोध॑ति । त्मना॑ ॥

Mantra without Swara
ये अग्ने चन्द्र ते गिरः शुम्भन्त्यश्वराधसः। शुष्मेभिः शुष्मिणो नरो दिवश्चिद्येषां बृहत्सुकीर्तिर्बोधति त्मना ॥

ये। अग्ने। चन्द्र। ते। गिरः। शुम्भन्ति। अश्वऽराधसः। शुष्मेभिः। शुष्मिणः। नरः। दिवः। चित्। येषाम्। बृहत्। सुऽकीर्त्तिः। बोधति। त्मना ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 2 Mantra » 4

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Meaning
हे (चन्द्र) आनन्द देनेवाले (अग्ने) विद्वन् ! (ते) आपकी (अश्वराधसः) बिजुली आदि पदार्थों की सिद्धि करनेवाली (गिरः) धर्मसम्बन्धिनी वाणियों को (ये) जो (शुष्मेभिः) बलों के साथ (शुष्मिणः) बली (दिवः) कामना करते हुए (चित्) भी (नरः) मुख्य नायकजन (शुम्भन्ति) विराजते हैं और (येषाम्) जिनकी इन वाणियों को (बृहत्, सुकीर्त्तिः) बड़ी उत्तम प्रशंसायुक्त आप (त्मना) आत्मा से (बोधति) जानते हैं, वे मित्र हों ॥४॥
Essence
जो विद्वान् सदृश गुण, कर्म और स्वभाववाले मित्र होकर अग्नि आदि पदार्थों की विद्याओं को परस्पर जनाते हैं, वे सिद्ध मनोरथवाले होते हैं ॥४॥
Subject
फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

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