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Rigveda Mandal 4 / Sukta 6 / Mantra 8

58 Sukta
11 Mantra
4/6/8
Devata- अग्निः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
द्विर्यं पञ्च॒ जीज॑नन्त्सं॒वसा॑नाः॒ स्वसा॑रो अ॒ग्निं मानु॑षीषु वि॒क्षु। उ॒ष॒र्बुध॑मथ॒र्यो॒३॒॑ न दन्तं॑ शु॒क्रं स्वासं॑ पर॒शुं न ति॒ग्मम् ॥८॥

द्विः । यम् । पञ्च॑ । जीज॑नन् । स॒म्ऽवसा॑नाः । स्वसा॑रः । अ॒ग्निम् । मानु॑षीषु । वि॒क्षु । उ॒षः॒ऽबुध॑म् । अ॒थ॒र्यः॑ । न । दन्त॑म् । शु॒क्रम् । सु॒ऽआस॑म् । प॒र॒शुम् । न । ति॒ग्मम् ॥

Mantra without Swara
द्विर्यं पञ्च जीजनन्त्संवसानाः स्वसारो अग्निं मानुषीषु विक्षु। उषर्बुधमथर्यो३ न दन्तं शुक्रं स्वासं परशुं न तिग्मम् ॥

द्विः। यम्। पञ्च। जीजनन्। सम्ऽवसानाः। स्वसारः। अग्निम्। मानुषीषु। विक्षु। उषःऽबुधम्। अथर्यः। न। दन्तम्। शुक्रम्। सुऽआसम्। परशुम्। न। तिग्मम्॥८॥

Ashtak » 3 Adhyay » 5 Varga » 5 Mantra » 3

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Meaning
जो विद्वान् लोग (मानुषीषु) मनुष्यसम्बन्धिनी (विक्षु) प्रजाओं में (अग्निम्) अग्नि को (संवसानाः) उत्तम प्रकार आच्छादन करनेवाले जैसे (पञ्च) पाँच (स्वसारः) अंगुलियाँ वा (अथर्यः) नहीं हिंसित स्त्रियाँ (शुक्रम्) शुद्ध (दन्तम्) दाँत और (स्वासम्) सुन्दर मुख को (न) वैसे और जैसे (तिग्मम्) तीव्र (परशुम्) कुठार को (न) वैसे (यम्) जिस (उषर्बुधम्) प्रातःकाल में जाननेवाले को (द्विः) दो बार (जीजनन्) उत्पन्न करते हैं, वे सम्पूर्ण कार्य्य को सिद्ध कर सकें ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे अङ्गुलियों से सम्पूर्ण कार्य्य सिद्ध होते हैं, वैसे ही रात्रि के पिछले प्रहर में उठ के प्रजाओं के हित को सिद्ध करो। तीक्ष्ण कुठार के सदृश दुःखों को काट के युवावस्था विशिष्ट स्त्रियाँ शुद्ध मुख और दाँत को करतीं, उनके सदृश प्रजाओं को शुद्ध कर और सुख देकर द्विजों को विद्या के जन्म से युक्त करो ॥८॥
Subject
फिर विद्वानों के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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