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Rigveda Mandal 4 / Sukta 53 / Mantra 5

58 Sukta
7 Mantra
4/53/5
Devata- सविता Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्रिर॒न्तरि॑क्षं सवि॒ता म॑हित्व॒ना त्री रजां॑सि परि॒भूस्त्रीणि॑ रोच॒ना। ति॒स्रो दिवः॑ पृथि॒वीस्ति॒स्र इ॑न्वति त्रि॒भिर्व्र॒तैर॒भि नो॑ रक्षति॒ त्मना॑ ॥५॥

त्रिः । अ॒न्तरि॑क्षम् । स॒वि॒ता । म॒हि॒ऽत्व॒ना । त्री । रजां॑सि । प॒रि॒ऽभूः । त्रीणि॑ । रो॒च॒ना । ति॒स्रः । दिवः॑ । पृ॒थि॒वीः । ति॒स्रः । इ॒न्व॒ति॒ । त्रि॒ऽभिः । व्र॒तैः । अ॒भि । नः॒ । र॒क्ष॒ति॒ । त्मना॑ ॥

Mantra without Swara
त्रिरन्तरिक्षं सविता महित्वना त्री रजांसि परिभूस्त्रीणि रोचना। तिस्रो दिवः पृथिवीस्तिस्र इन्वति त्रिभिर्व्रतैरभि नो रक्षति त्मना ॥

त्रिः। अन्तरिक्षम्। सविता। महिऽत्वना। त्री। रजांसि। परिऽभूः। त्रीणि। रोचना। तिस्रः। दिवः। पृथिवीः। तिस्रः। इन्वति। त्रिऽभिः। व्रतैः। अभि। नः। रक्षति। त्मना ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 4 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (परिभूः) सब स्थानों में वर्त्तमान और सब के ऊपर विराजमान (सविता) सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों का उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर (महित्वना) महिमा और (त्मना) आत्मा से (अन्तरिक्षम्) भीतर नहीं नाश होनेवाले आकाश को (त्रिः) तीन वार (इन्वति) व्याप्त होता (त्री) तीन प्रकार के (रजांसि) उत्तम मध्यम निकृष्ट लोकों को व्याप्त होता (त्रीणि) तीन प्रकार के (रोचना) बिजुली, भौतिक और सूर्यरूप ज्योतियों को व्याप्त होता (तिस्रः) तीन प्रकार के (दिवः) प्रकाशों और (तिस्रः) तीन प्रकार की (पृथिवीः) भूमियों को व्याप्त होता और (त्रिभिः) तीन (व्रतैः) नियमों से (नः) हम लोगों की (अभि) सब ओर से (रक्षति) रक्षा करता है, वही सर्वदा सेवा करने योग्य है ॥५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो परमेश्वर तीन प्रकार के सम्पूर्ण त्रिगुण अर्थात् सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण स्वरूप जगत् को रच के उत्तम नियमों से पालन करता है, उसी की उपासना करो ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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