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Rigveda Mandal 4 / Sukta 51 / Mantra 10

58 Sukta
11 Mantra
4/51/10
Devata- उषाः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
र॒यिं दि॑वो दुहितरो विभा॒तीः प्र॒जाव॑न्तं यच्छता॒स्मासु॑ देवीः। स्यो॒नादा वः॑ प्रति॒बुध्य॑मानाः सु॒वीर्य॑स्य॒ पत॑यः स्याम ॥१०॥

र॒यिम् । दि॒वः॒ । दु॒हि॒त॒रः॒ । वि॒ऽभा॒तीः । प्र॒जाऽव॑न्तम् । य॒च्छ॒त॒ । अ॒स्मासु॑ । दे॒वीः॒ । स्यो॒नात् । आ । वः॒ । प्र॒ति॒ऽबुध्य॑मानाः । सु॒ऽवीर्य॑स्य । पत॑यः । स्या॒म॒ ॥

Mantra without Swara
रयिं दिवो दुहितरो विभातीः प्रजावन्तं यच्छतास्मासु देवीः। स्योनादा वः प्रतिबुध्यमानाः सुवीर्यस्य पतयः स्याम ॥

रयिम्। दिवः। दुहितरः। विऽभातीः। प्रजाऽवन्तम्। यच्छत। अस्मासु। देवीः। स्योनात्। आ। वः। प्रतिऽबुध्यमानाः। सुऽवीर्यस्य। पतयः। स्याम ॥१०॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 2 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (दिवः) सूर्य्य की (विभातीः) प्रकाश करती हुई (दुहितरः) कन्याओं के सदृश वर्त्तमान किरणें प्रकाश को देती हैं, हे (देवीः) विदुषियों ! वैसे (अस्मासु) हम लोगों में (स्योनात्) सुख से (प्रजावन्तम्) बहुत प्रजायुक्त (रयिम्) धन को (आ, यच्छत) ग्रहण करो (वः) तुम को (प्रतिबुध्यमानाः) प्रतिबोध कराते हुए हम लोग (सुवीर्यस्य) उत्तम पराक्रम युक्त सेना के (पतयः) स्वामी (स्याम) होवें ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो कन्या प्रभात वेला के सदृश उत्तम प्रकार शोभित सुख को उत्पन्न करती हैं, उनके साथ स्वयंवर विवाह से ही मनुष्य श्रीमान् होते हैं ॥१०॥
Subject
अब अगले मन्त्र से स्वयंवर विवाह कहा है ॥

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