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Rigveda Mandal 4 / Sukta 49 / Mantra 1

58 Sukta
6 Mantra
4/49/1
Devata- इन्द्राबृहस्पती Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ॒दं वा॑मा॒स्ये॑ ह॒विः प्रि॒यमि॑न्द्राबृहस्पती। उ॒क्थं मद॑श्च शस्यते ॥१॥

इ॒दम् । वा॒म् । आ॒स्ये॑ । ह॒विः । प्रि॒यम् । इ॒न्द्रा॒बृ॒ह॒स्प॒ती॒ इति॑ । उ॒क्थम् । मदः॑ । च॒ । श॒स्य॒ते॒ ॥

Mantra without Swara
इदं वामास्ये हविः प्रियमिन्द्राबृहस्पती। उक्थं मदश्च शस्यते ॥

इदम्। वाम्। आस्ये। हविः। प्रियम्। इन्द्राबृहस्पती इति। उक्थम्। मदः। च। शस्यते ॥१॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 25 Mantra » 1

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Meaning
हे (इन्द्राबृहस्पती) बिजुली और सूर्य्य के सदृश मन्त्री और राजा ! (वाम्) आप दोनों के (आस्ये) सुख में (इदम्) यह (प्रियम्) सुन्दर (उक्थम्) प्रशंसा करने योग्य (मदः) आनन्द (च) और (हविः) खाने योग्य वस्तु (शस्यते) स्तुति किया जाता है ॥१॥
Essence
जो राजा आदि मनुष्य उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्न को खाते हैं तो प्रकाशयुक्त अधिक अवस्थावाले और बलवान् होते हैं ॥१॥
Subject
अब छः ऋचावाले उनचासवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में राजा और प्रजा की कैसे वृद्धि हो, इस विषय को कहते हैं ॥

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