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Rigveda Mandal 4 / Sukta 39 / Mantra 3

58 Sukta
6 Mantra
4/39/3
Devata- दध्रिकाः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यो अश्व॑स्य दधि॒क्राव्णो॒ अका॑री॒त्समि॑द्धे अ॒ग्ना उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ। अना॑गसं॒ तमदि॑तिः कृणोतु॒ स मि॒त्रेण॒ वरु॑णेना स॒जोषाः॑ ॥३॥

यः । अश्व॑स्य । द॒धि॒ऽक्राव्णः॑ । अका॑रीत् । सम्ऽइ॑द्धे । अ॒ग्नौ । उ॒षसः॑ । विऽउ॑ष्टौ । अना॑गसम् । तम् । अदि॑तिः । कृ॒णो॒तु॒ । सः । मि॒त्रेण॑ । वरु॑णेन । स॒ऽजोषाः॑ ॥

Mantra without Swara
यो अश्वस्य दधिक्राव्णो अकारीत्समिद्धे अग्ना उषसो व्युष्टौ। अनागसं तमदितिः कृणोतु स मित्रेण वरुणेना सजोषाः ॥

यः। अश्वस्य। दधिऽक्राव्णः। अकारीत्। सम्ऽइद्धे। अग्नौ। उषसः। विऽउष्टौ। अनागसम्। तम्। अदितिः। कृणोतु। सः। मित्रेण। वरुणेन। सऽजोषाः ॥३॥

Ashtak » 3 Adhyay » 7 Varga » 13 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो विद्वान् (दधिक्राव्णः) धारण करनेवालों को क्रमण करानेवाले (अश्वस्य) बड़े और विद्या में अर्थात् पदार्थविद्या के गुणों में व्याप्त (उषसः) प्रातःकाल की (व्युष्टौ) अनेक प्रकार की सेवा में और (समिद्धे) बहुत प्रदीप्त (अग्नौ) बिजुलीरूप अग्नि में (अनागसम्) अपराधरहित को (अकारीत्) करता है (तम्) उसको (अदितिः) माता व पिता निरपराध (कृणोतु) करे (सः) सो भी (मित्रेण) मित्र (वरुणेन) श्रेष्ठ के साथ (सजोषाः) तुल्य प्रीति सेवनेवाला हो ॥३॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो अग्नि में जल आदि पदार्थों के संयोग करने को जाने और जो सज्जनों के साथ मित्रता कर और प्रातःकाल उठ के श्रेष्ठ कर्मों को करता है, वही सदैव प्रसन्न होता है, यह जानो ॥३॥
Subject
अब प्रजाकृत्य को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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