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Rigveda Mandal 4 / Sukta 30 / Mantra 7

58 Sukta
24 Mantra
4/30/7
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
किमादु॒तासि॑ वृत्रह॒न्मघ॑वन्मन्यु॒मत्त॑मः। अत्राह॒ दानु॒माति॑रः ॥७॥

किम् । आत् । उ॒त । अ॒सि॒ । वृ॒त्र॒ऽह॒न् । मघ॑ऽवन् । म॒न्यु॒मत्ऽत॑मः । अत्र॑ । अह॑ । दानु॑म् । आ । अ॒ति॒रः॒ ॥

Mantra without Swara
किमादुतासि वृत्रहन्मघवन्मन्युमत्तमः। अत्राह दानुमातिरः ॥

किम्। आत्। उत। असि। वृत्रऽहन्। मघऽवन्। मन्युमत्ऽतमः। अत्र। अह। दानुम्। आ। अतिरः ॥७॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 20 Mantra » 2

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Meaning
हे (मघवन्) श्रेष्ठ धनयुक्त (वृत्रहन्) शत्रुओं के नाश करनेवाले ! (मन्युमत्तमः) प्रशंसित क्रोधयुक्त आप सूर्य्य मेघ को जैसे वैसे (दानुम्) देनेवाले का (आ, अतिरः) नाश करते हैं, (अत्र, अह, आत्, किम्, उत) अहह इस विषय में तो क्या अनन्तर आप राजा भी (असि) हो ॥७॥
Essence
जो राजा दुष्टों के ऊपर अति क्रोध करने और श्रेष्ठों में अत्यन्त शान्ति रखनेवाला होता है, वही राज्य बढ़ा सकता है ॥७॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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