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Rigveda Mandal 4 / Sukta 28 / Mantra 2

58 Sukta
5 Mantra
4/28/2
Devata- इन्द्रासोमौ Rishi- वामदेवः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्वा यु॒जा नि खि॑द॒त्सूर्य॒स्येन्द्र॑श्च॒क्रं सह॑सा स॒द्य इ॑न्दो। अधि॒ ष्णुना॑ बृह॒ता वर्त॑मानं म॒हो द्रु॒हो अप॑ वि॒श्वायु॑ धायि ॥२॥

त्वा । यु॒जा । नि । खि॒द॒त् । सूर्य॑स्य । इन्द्रः॑ । च॒क्रम् । सह॑सा । स॒द्यः । इ॒न्दो॒ इति॑ । अधि॑ । स्नुना॑ । बृ॒ह॒ता । वर्त॑मानम् । म॒हः । द्रु॒हः । अप॑ । वि॒श्वऽआ॑यु । धा॒यि॒ ॥

Mantra without Swara
त्वा युजा नि खिदत्सूर्यस्येन्द्रश्चक्रं सहसा सद्य इन्दो। अधि ष्णुना बृहता वर्तमानं महो द्रुहो अप विश्वायु धायि ॥

त्वा। युजा। नि। खिदत्। सूर्यस्य। इन्द्रः। चक्रम्। सहसा। सद्यः। इन्दो इति। अधि। स्नुना। बृहता। वर्तमानम्। महः। द्रुहः। अप। विश्वऽआयु। धायि ॥२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 17 Mantra » 2

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Meaning
हे (इन्दो) ऐश्वर्य्यवान् ! (त्वा) आपको (युजा) युक्तजन से (द्रुहः) द्वेष करनेवाले का सम्बन्ध (अप, धायि) नहीं धारण किया जाता और (महः) बड़ी (वर्त्तमानम्) वर्त्तमान (विश्वायु) सम्पूर्ण अवस्था (अधि) अधिक धारण की जाती है (बृहता) बड़े (स्नुना) व्याप्त (सहसा) बल से (सद्यः) शीघ्र (सूर्य्यस्य) सूर्य्य की (इन्द्रः) बिजुली के सदृश (चक्रम्) चक्र की जो (नि, खिदत्) दीनता को प्राप्त होता है, वह अपेक्षित सुख को प्राप्त होवे ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो विद्वान् राजा से पालित विद्या धर्म्म और ब्रह्मचर्य्य आदि से युक्त अतिकाल पर्य्यन्त जीवनेवाले होवें, वे शत्रुओं के जीतनेवाले होते हैं ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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