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Rigveda Mandal 4 / Sukta 24 / Mantra 5

58 Sukta
11 Mantra
4/24/5
Devata- इन्द्र: Rishi- वामदेवो गौतमः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आदिद्ध॒ नेम॑ इन्द्रि॒यं य॑जन्त॒ आदित्प॒क्तिः पु॑रो॒ळाशं॑ रिरिच्यात्। आदित्सोमो॒ वि प॑पृच्या॒दसु॑ष्वी॒नादिज्जु॑जोष वृष॒भं यज॑ध्यै ॥५॥

आत् । इत् । ह॒ । नेमे॑ । इ॒न्द्रि॒यम् । य॒ज॒न्ते॒ । आत् । इत् । प॒क्तिः । पु॒रो॒ळाश॑म् । रि॒रि॒च्या॒त् । आत् । इ॒त् । सोमः॑ । वि । प॒पृ॒च्या॒त् । असु॑स्वीन् । आत् । इत् । जु॒जो॒ष॒ । वृ॒ष॒भम् । यज॑ध्यै ॥

Mantra without Swara
आदिद्ध नेम इन्द्रियं यजन्त आदित्पक्तिः पुरोळाशं रिरिच्यात्। आदित्सोमो वि पपृच्यादसुष्वीनादिज्जुजोष वृषभं यजध्यै ॥

आत्। इत्। ह। नेमे। इन्द्रियम्। यजन्ते। आत्। इत्। पक्तिः। पुरोळाशम्। रिरिच्यात्। आत्। इत्। सोमः। वि। पपृच्यात्। असुस्वीन्। आत्। इत्। जुजोष। वृषभम्। यजध्यै ॥५॥

Ashtak » 3 Adhyay » 6 Varga » 11 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जिनके (पुरोळाशम्) उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्न को (पक्तिः) पाक (रिरिच्यात्) बढ़ावें वे (नेमे) अन्य जन (आत्) अनन्तर (इत्) ही (इन्द्रियम्) धन को (यजन्ते) प्राप्त होते हैं और जिसके (आत्) अनन्तर (इत्) ही (सोमः) ऐश्वर्य (असुष्वीन्) जो प्राणों को प्राप्त होते हैं उनको (वि, पपृच्यात्) संयुक्त हो वह (आत्) अनन्तर (इत्) ही (यजध्यै) मिलने के लिये (वृषभम्) बलिष्ठ का (जुजोष) सेवन करता है (आत्) अनन्तर (इत्, ह) ही वे सब राज्य और बल को प्राप्त होने के योग्य होवें ॥५॥
Essence
जो जन उत्तम प्रकार संस्कारयुक्त अन्नों का पाक करके रुचिपूर्वक भोजन करते हैं, वे बल को प्राप्त होके रोग से रहित होने के योग्य होवें और ऐश्वर्य्य को प्राप्त होके धर्म्म और यथार्थवक्ता पुरुषों की सेवा करें ॥५॥
Subject
अब योग्य आहार-विहार विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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